नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 76

परिशिष्ट 59

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इस बचाव तर्क का आसानी से उत्तर दिया जा सकता है। इस तर्क का कारण शायद यह है कि जो इसका सहारा लेते हैं, वे उस प्रांत के राजनीतिक वातावरण से परिचित नहीं है, जिनके बारे में तालिका 2 से 6 में आंकडे दिए गए हैं। यदि उन्हें पता होता,तो शायद वे यह रास्ता न अपनाते, क्योंकि उनका संबंध कांग्रेस प्रांतो से है। इन प्रांतो में कांग्रेस का बहुमत था और उसी के मंत्रिमंडल थे। स्पष्ट है की यदि शासक जातियों के प्रभावित प्रांत शासित जातियों पर अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो सकें, तो यह कहना कठिन है कि कांग्रेस उसके परिणाम से कैसे पल्ला झाड़ सकती है। कांग्रेस एक सुगठित पार्टी है। चुनाव लड़ने के लिए उसकी एक योजना होती है। प्रत्येक प्रांत में एक संसदीय बोर्ड था जिसके कार्य थे - (1) चुनाव में प्रत्याशियों का चयन करना (2) मंत्रिमंडल गठन पर निर्णय करना, और (3) मंत्रियों पर कार्रवाइयों पर नियंत्रण रखना। प्रांतीय संसदीय बोर्ड के ऊपर संसदीय बोर्ड है जो प्रांतीय संसदीय बोर्डो का अधीक्षण और नियंत्रण करता है। इस चुनाव का नियोजन और नियंत्रण कांग्रेस ने किया, इसलिए यह कहना व्यर्थ है कि यदि 1937 के चुनवो में शासक जातियों ने सत्ता हथिया ली, तो उसके लिए कांग्रेस जिम्मदार नहीं है।

बचाव का दूसरा तर्क भी पहले की तरह लचर है। जो लोग यह दलील देते हैं कि कांग्रेस प्रांतों में शासक जातियों का वर्चस्व मात्र एक संयोग है, उसके पीछे कोई संकल्प नहीं है, उन्हें पता होना चाहिए कि जो तर्क वे दे रहे हैं, वह थोथा है। जो लोग इसे मात्र संयोग मानते हैं, मैं उनका ध्यान निम्नलिखित परिस्थितियों की ओर आकर्षित करता हूँ।

सबसे पहले वे कांग्रेस हाई कमान के प्रमुख सदस्यों की मनोवृत्ति को देखें, जो अतीत में कांग्रेस के भाग्यनिर्माता रहे हैं और फिलहाल भी कांग्रेस की डोर जिनके हाथ में है। बेहतर होगा कि तिलक से आरंभ करें। अब वे दिवगंत है, परंतु जीवन काल में वे कांग्रेस के प्रमुख नेता थे और पार्टी पर उनका सबसे अधिक दबदबा था। श्री तिलक ब्राह्मण थे और शासक जातियों से सम्बद्ध थे। वैसे वे स्वराज आंदोलन के जनक कहे जाते हैं। परंतु शासित जातियों के प्रति उनकी उपेक्षा सुविदित है। स्थानाभव के कारण मैं यहां शासित वर्ग के प्रति उनकी मनोवृत्ति का मात्र एक उदहारण प्रस्तुत करूंगा। 1918 में जब गैर-ब्राह्मण लोगों तथा पिछडे वर्ग के लोगों ने विधान सभाओं मे अपने पृथक प्रतिनिधित्व के लिए आंदोलन आरंभ किया, तो श्री तिलक ने शोलापुर में हुई जन सभा में कहांः फ्मैं नहीं समझता कि तेल निकालने वाले तेली, तमोली,