60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
धोबी इत्यादि गैर-ब्राह्मण और पिछड़े वर्ग के लोग विधान सभाओं में क्यों जाना चाहते है?य् श्री तिलक के विचार से उस वर्ग का कार्य है, आदेशों और कानूनों का मानना। तिलक के पश्चात मैं वल्लभभाई पटेल को लेता हूं । उनकी मनोवृत्ति पर भी मैं एक ही उदहारण दूंगा। वर्ष 1942 में लार्ड लिनथिगों ने विभिन्न वर्गो के 52 गणमान्य भारतीय प्रतिनिधियों को इस बात पर विचार करने के लिए आमंत्रित किया कि उस समय युद्ध के अवसर पर भारत सरकार को सहानुभूतिपूर्वक सहयोग देने के लिए उठए जाने के संबंध में उनकी क्या राय है। उन आमंत्रित व्यक्तियों में अनुसूचित जातियों के भी सदस्य थे। श्री वल्लभभाई पटेल को वायसराय का यह विचार पसंद नहीं आया की ओछी जातियों की ऐसी भीड़ आमंत्रित की जाए। उस घटना के तुरंत बाद श्री वल्लभभाई पटेल ने अहमदाबाद में हुई जनसभा में कहा फ्वायसराय ने हिंदू महासभा के नेताओं को आमंत्रित किया, मुस्लिम लीग के नेताओं को बुलाया, तेलियों, मोचियों और अन्य लोगो की आमंत्रित कियाय् ।
यद्यपि श्री पटेल ने अपनी ईष्यालु और कटाक्षपूर्ण भाषा में तेलियों और मोचियों का नाम विशेष तौर पर लिया, परंतु उनका भाषण इस बात का संकेत करता है कि शासक वर्ग तथा कांग्रेस हाई कमान के सदस्य इस देश के दमित वर्गो के प्रति कैसी अपमानजनक भावनएं रखते थे।
यह जानना बेहतर होगा की पंडित नेहरू की क्या प्रतिक्रिया थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू एक ब्राह्मण हैं, परंतु उनके विषय में प्रचलित है की वे स्वभाग से गैर-सांप्रदायिक हैं और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं। पंरतु तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते। किसी व्यक्ति के पिता का देहांत हो जाता है तो रूढि़वादी हिंदू गंगा किनारे पंडो पुरोहितों से कर्मकांड कराते हैं। ऐसा संस्कार कराने वाले व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा जा सकता। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1931 में अपने पिता की मृत्यु पर वही किया। उनको पट्टाभिसीतारमैया तक ने गैर-सांप्रदायवादी बताया है कि पंडित नेहरू को इस बात पर गर्व है कि वह ब्राह्मण है। यह जान कर उन लोगों को धक्का लगेगा जो पंडित नेहरू को भारत का उत्कृष्ट राष्ट्रवादी हिंदू नेता समझते है। श्री पट्टाभिसीतारमैया को यह पता होना चाहिए कि वह क्या कह रहे हैं। इससे भी बढ़ कर यह बात है कि पंडित नेहरू संयुक्त प्रांत से संबंध रखते हैं, वहां उनका पूरा नियंत्रण है, उस प्रांत के मंत्रिमंडल के सभी सदस्य ब्राह्मण हैं।
ऽ 1. जे.ई. संजना द्वारा सेंस एंड नानसेंस इन पोलिटिक्स-गुजराती साप्ताहिक के रस्त रहबर, 14 जून, 1943 में उद्धत ।.
हिज इन्वीटेशन टु जवाहरलाल नेहरू, पृ. 16, वाई.जी. कृष्णामूर्ति।
सैंस एण्ड नानसैंस इन पोलिटिक्स धारावाहिक 12 रस्त रहबर, 1945