परिशिष्ट 73
मात्र कार्यक्षमता को ही कसौटी नहीं माना जा सकता। यदि इसे ही कसौटी मान लिया जाए, तो परिणाम यही होगा कि फ्रांस के मामलों को जर्मन देखेंगे और तुर्की के रूस और चीनियों के मामलो को जापानी देखेंगे। जो लोग अच्छी सरकार के बारे में खाली कार्यक्षमता को तूल देते हैं वे फ्रांसीसियों, तुर्की और चीनियों से इस बारे में बात करें और पूछें कि इस बारे में उनके क्या विचार है, और उनके परिपालन के क्या परिणाम सामने आएंगे । एक भौंदू व्यक्ति भी अंदाजा लगा सकता है कि इसका क्या उत्तर होगा। मुझे विश्वास है कि इस सिद्धांत की खिचड़ी ऐसी पकेगी कि वह एकदम बकवास होगी। भारत में यह सिद्धांत कैसे लागू हो सकता है, जहां शासक जातियां और मेहनकश जातियों का अंतर वैसा ही है, जैसा फ्रांसीसी और जर्मन, तुर्क और रूसियों और चीनियों और जापानियों के बीच है? वास्तविकता तो यह है कि भारत की स्वार्थलिप्त शासक जातियों को यह ख्याल ही नहीं है कि खाली कार्यक्षता का सिद्धांत कितना बेहूदा है और समझती हैं कि वह अपनी मर्जी का कानून बना सकती है, उन्हे इस बात की परवाह नहीं कि मेहनकश जातियों का इस मामले में क्या विचार है।
शासक जातियां यह जानने की परवाह नहीं करती कि उन्होंने क्या-क्या हथकंडे अपना कर अपना वर्चस्व स्थापित किया है। उन्हें अपने मन को टटोलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती, कुछ तो इसलिए कि वे सोचते हैं कि इससे कोई गरज नहीं कि उन्होंने सत्ता कैसे हथियाई_ बस इतना ही काफी है कि वे मेहनतकश जातियों को अपने पांव तले दबा कर रखने की स्थिति में है। मान लिजिये कि शासक जातियां यह जानना जरूरी न समझें कि वे कैसे तीसमारखां बन बैठी तो उन्हें कैसे असलियत का पता चलेगा? यह जान कर आश्चर्य होगा कि शासक जातियों ने ये अधिकार इसी आरक्षण के बलबूते पर बटोरे हैं, जिसको आज वे सांप्रदायिकता के नाम पर उछाल कर विरोध कर रहें है। बहुतों के लिए इस कथन को पचा पाना मुश्किल होगा। जिन्हें इसमें कोई संदेह हो उन्हें और कुछ करने की जरूरत नहीं । बस वे मनुस्मृति के पन्ने पलट कर देख लें, जो हिंदुओं का बाइबिल है। उसमें उन्हें जो देखने को मिलेगा, उससे उनका दिल बैठ जाएगा जब वे पांएगे कि इन मठाधीश जातियों के सरगना ब्राह्मणों ने राजसत्ता बौद्धिकता के बल पर अर्जित नहीं की है-बौद्धिकता किसी की बपौती नहीं है-बल्कि मात्र सांप्रदायिकता के नाम पर वे इस स्थिति में आए। मनुस्मृति के विधान के अनुसार पुरोहित के पद, सम्राट के कुलगुरू और प्रमुख सलाहकार न्यायकर्म और दंडाधीश के पद और सम्राट के मंत्रियों के पद ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित थे। यहां तक कि सेना के सेनापति के पद के लिए उसकी संस्तुति की गई कि वही योग्य और सुपात्र है हालांकि उसे आरक्षित नहीं किया गया। सभी महत्वपूर्ण पद ब्राह्मणों