108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः हम ऐसा सोच रहे हैं। इस बारे में हम विभिन्न पक्षों के सुझाव को जानना चाहेंगे कि ऐसे क्या निर्देश हैं जो वे बोर्ड को देना चाहेंगे।
श्री पी. जे. ग्रिफिथ्स ः अतः आप इस विषय में अनभिज्ञ हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः यह अनभिज्ञता नहीं है अपितु खुला दिमाग है। यही मार्ग है जिस पर चल कर मैं अपनी स्थिति को आगे सही ढंग से स्पष्ट कर सकूंगा।
श्री ग्रिफिथ्स और अन्य सदस्यों ने इस विधेयक के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि सरकार ने खंड 27(झ) द्वारा सरकारी कारोबारों को इससे छूट देकर अतार्किक कार्य किया है।
अब, श्रीमन्, मैं पहली बात उठाना चाहूंगा जो इस विचार के उत्तर में है कि तर्क निश्चित रूप से सदैव ही जीवन नहीं होता। ऐसे कई अवसर आते हैं जब अतार्किकता की अपेक्षा अतिवाद को अधिक महत्व देगा। जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार है, यदि कोई भी बात खंड 28(झ) के संबंध में कही जा सकती है तो वह यह है कि सरकार डरपोक नहीं है, सरकार अतार्किक नहीं है, अपितु सरकार बुद्धिमान है और सरकार सचेत है। मेरा विचार है कि इस खंड को कुछ गलत समझा गया है। ऐसा कोई इरादा नहीं है कि इस विधेयक के उपबंधों से सरकार को मुक्त रखा जाए। जो भी कहा गया है वह यह है कि एक ऐसी तारीख निश्चित की जाएगी जब इस विधेयक के उपबंध सरकारी कारोबारों पर लागू किए जाएंगे। इसलिए सरकार के पक्ष में कोई विभेद है तो इस विधेयक के लागू करने के संबंध में नहीं है अपितु उस तारीख के बारे में है जिस पर इसे सरकार पर लागू किया जाएगा।
श्री पी. जे. ग्रिफिथ्स ः ऐसा क्यों किया गया है?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः इसकी आवश्यकता हो सकती है।
श्री पी. जे. ग्रिफिथ्स ः ऐसी आवश्यकता क्या है?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः जैसा कि मैंने पहले कहा, मैं इस समय किसी भी वाद-विवाद में उलझना नहीं चाहता और जैसा कि डाक और तार विभाग के सचिव ने कहा है, सरकार यह महसूस करती है कि फिलहाल किसी भी दशा में ऐसे सरकारी विभाग जो श्रमिकों के नियोक्ता हैं, अपने मजदूर संघों के साथ विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त उपबंध रखते हैं और इस तथ्य की दृष्टि से कि सरकार ने निश्चय ही निजी नियोक्ताओं की अपेक्षा मजदूर संघों को मान्यता देने के लिए