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तीस वर्ष पूर्व एक महार युवक के लिए शिक्षा के द्वारा अवसर की स्वर्णिम भावनाओं के द्वार खुल गए और उसने संकल्प किया कि उसका जीवन उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध धर्मयुद्ध छेड़ने में व्यतीत होगा जिसने उसे और उसके निकट संबंधियों को अछूत घोषित किया है और जिनकी छाया पड़ने से ही सवर्ण हिंदू अपने घर में भी रह कर अपवित्र हो जाता है। आज डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर को वाइसराय की कार्यकारी कौंसिल में श्रम विभाग का कार्यभार दिया गया है, किन्तु अभी भी वह यह महसूस करते हैं कि उनका सर्वप्रथम कर्तव्य तथाकथित दलित वर्ग में आने वाले लाखों भारतीयों के प्रति है और उनके उद्धार के कार्य में अगुआई करते समय निजी-स्वार्थ या महत्वाकांक्षाएं आड़े नहीं आनी चाहिए।
जिन्हें इस संबंध मेंं जानकारी है कि उन्होंने हिंदू सामाजिक पद्धति पर किस प्रकार प्रहार किया और सवर्ण हिंदू नेताओं से उनका किस प्रकार का मतभेद था उन्हें निश्चित रूप से यह अनुभव होगा कि वह बहुत खरी बात कहने वाले व्यक्ति थे। किन्तु जिन्हेंं उनके जीवन वृत्त और पूर्ववृत्त की जानकारी है वे आश्चर्य करते हैं कि उनमें इससे भी अधिक कड़वाहट क्यों नहीं है और जिस प्रकार अपने जीवन को अस्पृश्यता के विरुद्ध जिहाद छेड़ने में इतने बड़े पैमाने पर किस प्रकार संलग्न कर दिया है कि इस बारे में अनेक क्षेत्रों में रुचि उत्पन्न हो गई है और बड़ी योग्यता के साथ उन्होंने विविध विषयों का अध्ययन किया है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस अछूत ने किस प्रकार शिक्षा का जुगाड़ किया? उत्तर सीधा-सादा है - उनके समुदाय के लोग, अर्थात महार, कृषक, गांव में सेवादार और सैनिक होते हैं। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की बाम्बे सेना को एक बार सैनिक उपलब्ध कराए, ठीक जैसे कि बिहार के दुसाधों और मद्रास के परिहाओं ने उन प्रांतों में कंपनी की सेना को सिपाही दिए थे। उस समय सिपाहियों को सेना में शिक्षा दी जाती थी और अम्बेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी अम्बेडकर सैनिक विद्यालय में अध्यापक रह चुके थे।
ऽ इंडियन इनफार्मेशन, 1 मार्च, 1943, पृष्ठ 194-95, यह लेख ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित
किया गया था। लेख पर लेखक के नाम मुद्रित नहीं है - संपादक