64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वरूप से मेल खाता हो तो निश्चय ही मैं कोई आपत्ति नहीं करूंगा कि प्रवर समिति में इस पर विचार किया जाए।
मेरे माननीय मित्र श्री मिलर ने विधेयक के एक या दो खंडों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। पहला उपबंध 5(3) है। इस संबंध में मैंने अपना उत्तर दे दिया है कि सरकार ने सावधानी बरतते हुए जानबूझकर यह उपखंड जोड़ा है क्योंकि सरकार समझती है कि ऐसा औचित्य उभर सकता है कि इस विधेयक के उपबंधों का विस्तार करना पड़े।
दूसरी धारा जिसकी ओर उन्होंने इशारा किया है, वह धारा 10 का उपखंड (3) है। उनकी आलोचना का बिंदु था कि सरकार इस उपबंध के द्वारा यह विचार कर रही है कि यदि कोष में से कोई राशि शेष रह जाती है तो इस राशि को सामान्य राजस्व में अंतरित कर दिया जाएगा। मैं समझता हूं श्री मिलर का कहना यह था कि भारत सरकार की यह नीति मामले की परिस्थितियों को देखते हुए न्यायोचित नहीं है। किंतु यदि श्री मिलर इस तथ्य को ध्यान में रखेंगे जिसका मैं उल्लेख कर चुका हूं, अर्थात कि ऐसा धन जो प्रीमियम के रूप में नियोजकों द्वारा इस निधि में डाला जाएगा उसका बहुत बड़ा हिस्सा ई.पी.टी. से निकल आएगा, तो ऐसी हालत में केवल यही उचित है कि सरकार ऐसे अतिशेष की वसीयतदार बनें। महोदय, मुझे इससे अधिक कुछ नहीं कहना है।
श्री ई. एल. सी. ग्विल्ट (बंबईः यूरोपीय)ः क्या मैं माननीय सदस्य से एक प्रश्न कर सकता हूं। उन्होंने अपने भाषण में कहा है कि इस स्कीम का आरंभ मिल मालिकों के संघ ने किया है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः उन्होंने ऐसा सुझाव दिया था।
श्री ई. एल. सी. ग्विल्टः उन्होंने ऐसा सुझाव दिया था कि क्षतिपूर्ति पूर्ण रूप से की जाने के बाद यदि निधि में कोई रकम बच जाती है तो उसका व्यय औद्योगिक अनुसंधान पर किया जाए और ऐसा है तो क्या मेरे माननीय मित्र इस सुझाव पर विचार करेंगे?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मुझे स्मरण नहीं है, किन्तु मैं इसकी जांच करूंगा।
सभापति महोदय (सैयद गुलाम भीक नायरंग)ः प्रश्न यह हैः
‘‘कि युद्ध से आहत होने वाले कामगारों को मुआवजा देने का दायित्व नियोजकों पर अधिरोपित करने और ऐसे दायित्व के लिए नियोजकों द्वारा बीमा कराने का उपबंध करने वाला विधेयक एक प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाए जिसके सदस्य श्री