136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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ऽमंत्रिमंडलीय शिष्टमंडल (केबिनेट मिशन) तथा अछूत
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मंत्रिमंडलीय शिष्टमंडल ने अछूतों की उपेक्षा कैसे की?
मंडिमंडलीय शिष्टमंडल ने अपने 10 मई के बयान में भारत में राजनीतिक गतिरोध के समाधान के लिए अंतरिम तथा दीर्घकालीन प्रस्ताव किए। उनके प्रस्तावों का सबसे अधिक कष्टदायी तथा विस्मयकारक पहलू अछूतों को भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक पृथक तथा अलग घटक के रूप में मानने से इंकार करना था। आयोग ने अछूतों की इतनी अधिक पूर्णतया उपेक्षा की है कि उन्होंने अपने लम्बे वक्तव्य में उनका एक बार भी उल्लेख नहीं किया है। मंत्रिमंडलीय आयोग ने अछूतों की किस हद तक उपेक्षा की हैं, यह बात निम्नलिखित से स्पष्ट हो जाएगीः-
( i ) अछूतों को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वे सिखों तथा मुसलमानों की तरह अपने प्रतिनिधियों को केन्द्रीय कार्यपालिका में मनोनीत कर सकें। वर्तमान अंतरिम सरकार में, उनके पास अनुसूचित जातियों के दो प्रतिनिधि हैं, उनमें से एक की भी अनुसूचित जातियों के प्रति कोई निष्ठा या दायित्व नहीं है। उनमें से एक कांग्रेस द्वारा नामित है तथा दूसरा मुस्लिम लींग द्वारा नामित है।
( ii ) अंतरिम सरकार में अछूतों को प्रतिनिधित्व एक निश्चित कोटा में नहीं दिया गया जैसा कि मुसलमानों को दिया गया है। 1945 की शिमला कांफ्रेंस में इस बात पर सहमति हुई थी कि चौदह व्यक्तियों के मंत्रिमंडल में अनुसूचित जातियों के कम से कम दो सदस्य होने चाहिए। 1945 तथा 1946 के बीच व्यवहार में परिवर्तन का क्या कारण है, यह मालूम नहीं।
( iii ) उनको संविधान सभा में पृथक प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं दिया गया है।
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ऽ स्रोतः मुद्रित पुस्तिका-सं.