प्रस्तावों की समीक्षा
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मंत्रिमंडलीय शिष्टमंडल (केबिनेट मिशन) का निर्णय महामहिम की सरकार की स्थापित नीति से दूर कैसे आया?
- मंत्रिमंडलीय आयोग के निर्णय ने अछूतों के प्रति केवल एक गंभीर गलती ही नहीं की बल्कि यह उन सिद्धांतों से भी दूर चला गया जो महामहिम की सरकार का भारतीय राजनीति के संबंध में तथा अछूतों की स्थिति के संबंध में मार्ग-निर्देशन करते थे।
( i ) 1920 से पहले, भारत के शासन में संवैधानिक परिवर्तन ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकार से तथा अपनी स्वयं की इच्छा के अनुसार किए थे। 1920 में ही पहली बार वह अवसर आया था जब ब्रिटिश सरकार ने भारत का संविधान भारतीयों के साथ परामर्श करके बनाने का निर्णय किया। तदुनसार एक गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई गई, जिसमें भारतीयों को आमंत्रित किया गया। भारतीय प्रतिनिधियों में अछूतों के प्रतिनिधि थे जिन्हें कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक दल से पृथक तथा स्वतंत्र रूप में, अलग से, आमंत्रित किया गया था।
( ii ) गोलमेज कांफ्रेंस में कांग्रेस के प्रतिनिधि श्री गांधी ने, भारत के राष्ट्रीय जीवन में अछूतों को एक पृथक व अलग घटक/अंग के रूप में मान्यता देने का विरोध किया और यह दावा किया कि वे हिन्दुओं का भाग हैं और इसलिए वे पृथक प्रतिनिधित्व के हकदार नहीं है। ब्रिटिश सरकार ने गांधी के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया और उन्होंने अपने परिनिर्णय द्वारा यह माना कि अछूत भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक पृथक घटक/अंग है और इसलिए वे उन्हीं सुरक्षा उपायों के हकदार हैं जिस प्रकार भारत के अन्य अल्पसंख्यक जैसे मुलसमान तथा भारतीय इसाई आदि हैं।
( iii ) ब्रिटिश सरकार, जून, 1945 में हुई शिमला कांफ्रेंस में इस सिद्धांत पर जमी रही। उस कांफ्रेंस में आमंत्रित भारतीयों में एक प्रतिनिधि अछूतों का था जिसे कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक दल से अलग तथा स्वतंत्र रूप में आमंत्रित किया गया था।
( iv ) यह कहा जा सकता है कि संविधान सभा में, जो 1942 के क्रिप्स प्रस्तावों का एक भाग थी, अछूतों के पृथक प्रतिनिधित्व के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी और इसलिए मंत्रिमंडलीय आयोग के वर्तमान प्रस्तावों में कोई अंतर नहीं किया गया है। इसका उत्तर यह है कि उनमें अंतर किया गया है। 1942 के क्रिप्स प्रस्तावों में, यह बात नहीं है कि अकेले अछूतों को ही पृथक प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। तथ्य यह है कि संविधान सभा में किसी भी अल्पसंख्यक वर्ग को पृथक प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। परंतु मंत्रिमंडलीय आयोग की संविधान सभा के गठन में मुसलमानों तथा सिखों को पृथक मान्यता तथा पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है जिसे अछूतों के लिए नकार दिया गया है। इस भेदभाव के कारण व इस गलती के कारण ही