8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कोई भी सीट नहीं मिली है और उन्हें नामांकन द्वारा केवल एक सीट प्राप्त हुई है, जबकि अनुसूचित जातियों के लोगों की संख्या 4 करोड़ है और वे भारत में तीसरे बड़े समुदाय के लोग हैं।
- उपरोक्त तथ्यों पर उपयुक्त टिप्पणियां की जा सकती हैं। प्रथम, विधान सभा बिल्कुल असंतुलित सभा लगती है। यह दोनों ही दोषों से आक्रांत है, एक ओर कुछ समुदायों का अधिक प्रतिनिधित्व है तो दूसरी ओर अन्य समुदायों का बहुत अल्प प्रतिनिधित्व है। यह दोष बहुत गंभीर अवस्था में व्याप्त है। अधिक प्रतिनिधित्व वाले समुदाय अधिक शक्तिशाली और दृढ़ समुदाय हैं तथा अल्प प्रतिनिधित्व वाले समुदाय कमजोर और दीन समुदाय हैं। दूसरी टिप्न्पण्ी का संबंध नामांकन की शक्ति के गलत प्रयोग से है। संविधान के अंतर्गत नामांकन की शक्ति इसलिए आरक्षित की गई थी ताकि प्रतिनिधित्व की असमानताओं को सुधारा जाए। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि यह ऐसे समुदायों के लिए दी गई थी जिन्हें चुनाव द्वारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व प््राप्त नहीं है और जिन्हें नामांकन द्वारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त कराया जाए।
ऐसा कोई नियम नहीं है जो चुनाव अथवा नामांकन को प्रशासित करे- जहां तक कि केन्द्रीय विधान सभा के गठन से उनका संबंध है। यदि कोई नियम है तो यह कि ‘‘क’’ को ‘‘ख’’ की अपेक्षा अधिक सुविधा दी जाए और इसके बाद ‘‘ख’’ से अधिकार छीन कर, जो उसके पास वास्तव में नहीं है, ‘‘क’’ को देकर जिसके पास सब कुछ हैं, उसे और भी समृद्ध बना दिया जाए।
- प्रतिनिधित्व के मामले में अनुसूचित जातियों के साथ जो भयंकर भूल की गई है, उसका कोई औचित्य नहीं है। ऐसा किसी भी विधान सभा में जिसमें मुसलमान और हिन्दू अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, और वे दोनों ही इस बात के लिए सचेत हैं कि किसी भी तीसरे दल यथा अनुसूचित जातियों को कुछ भी न दिया जाए, ऐसी स्थिति में 141 सदस्यों के सदन में अनुसूचित जाति के एकल प्रतिनिधित्व से अनुसूचित जातियों के अधिकारों में क्या सहायता मिलेगी? साऊथबरो समिति का, जिसकी सिफारिशों के आधार पर केन्द्रीय विधान सभा की वर्तमान संरचना पोषित है, यह विचार था कि नामांकित सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपने मस्तिष्क में अनुसूचित जाति के हितों को रखेंगे । यह पर्याप्त विचारणीय मामला है कि तत्कालीन भारत सरकार ने इस मत को अस्वीकार कर दिया। साऊथबरो समिति की रिपोर्ट पर भारत सरकार ने कहा-
‘परंतु हमारे राय में यह व्यवस्था (मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड की) सुधार रिपोर्ट में
निर्दिष्ट लक्ष्यों के अनुसार नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दलित जातियों
को आत्म-सुरक्षा का सबक भी सीखना चाहिए। वास्तव में यह सोचना