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राजनीतिक शिकायतें

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कल्पना मात्र है कि ऐसी विधान सभा में जहां इस समुदाय का केवल एक

सदस्य ही है उससे ऐसी आशा की जाए, जबकि वहां साठ से नब्बे तक

सवर्ण हिन्दू जाति के सदस्य हैं। रिपोर्ट के पैरा 151, 152 और 155 के

सिद्धांतों को सार्थक बनाने के लिए हमें जाति से बहिष्कृत लोगों के साथ

अधिक उदार व्यवहार करना चाहिए....’

दुर्भाग्यवश, भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए केन्द्रीय विधान सभा के गठन में कोई उदारता नहीं दिखाई। भारत सकार ने नामांकन द्वारा उन्हें एक सीट दी और यह स्थिति 1921 से चली आ रही है।

  1. इस अल्प प्रतिनिधित्व का परिणाम बहुत निंदनीय रहा है। 141 सदस्यों की सभा में अनुसूचित जातियों के एकल प्रतिनिधित्व से हम उनकी घोर विवशता को महसूस कर सकते है। उसे सदन में हिंदू पक्ष से उत्पन्न अनुसूचित जाति के विरूद्ध पूर्वाग्रहों से लड़ना होगा। वह उस मुस्लिम ब्लाक के समर्थन पर भी निर्भर नही कर सकता जो अपने ही हितों को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। वह उस सरकारी ब्लाक पर भी निर्भर नहीं हो सकता जो हिन्दुओं और मुसलमानों के बृहद् ब्लाक के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने में अधिक सावधान है और अनुसूचित जातियों के हितों की चिंता नहीं कर पाता। सभा में अनुसूचित जातियों के एकल प्रतिनिधित्व से यह संभव नहीं है कि अनुसूचित जातियों की शिकायतों को उजागर किया जा सके। मेरी सूचना है कि विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा जो नियम बनाए गए हैं, उनके अनुसार अध्यक्ष उन माननीय सदस्यों को पहले बोलने का अवसर देते हैं जो किसी मान्यताप्राप्त पार्टी के सदस्य हैं। मुझे यह भी मालुम हुआ है कि अध्यक्ष किसी भी दल को मान्यता नहीं देते जब तक कि उस दल में कम से कम दस सदस्य न हों। इसका अर्थ यह है कि साधारणतया अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि को सदन में बोलने का कोई अवसर तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक कि वह किसी दल में सम्मिलित न हो। अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि को जिस स्थिति का सामना करना पड़ता है वह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। उसके किसी भी पार्टी में सम्मिलित होने का अभिप्राय यह है कि पार्टी के हितों के अधीन अनुसूचित जाति के हितों को रखा जाए जबकि पार्टी के नियम तथा हित अनुसूचित जाति के नियम तथा हितों से बिलकुल भी मेल नहीं रखते। दूसरी ओर, यदि वह किसी पार्टी में सम्मिलित न हों तो इसका अर्थ यह है कि वह बोलने का अधिकार बिल्कुल ही खो देता है। यदि कोई इस बात को देखे कि सभा के सत्र (सितम्बर 1942) की उस बहस में क्या हुआ जिसमें भारत की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर विचार-विमर्श किया गया था तो मालूम होगा कि उस समय