122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
करना चाहिए कि प्रांतीय स्वायत्तता का मामला संघीय योजना से कहीं भिन्न है। मैं उन लोगों से दो बातें कहना चाहता हूं, जो ये विचार करते हैं कि संघ स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। यदि गवर्नर - जनरल उन्हीं आधारों पर यह आवश्वासन दें, जैसा कि गवर्नरों द्वारा विचार किया गया था कि वे अपने विशेष उत्तरदायित्वों में अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे। सबसे पहले मैं इस बात से आश्वसत हूं कि गवर्नर - जनरल इस प्रकार का आश्वासन नहीं दे सकते, क्योंकि वह सम्राट के हित में ही इन शक्तियों का प्रयोग नहीं करते, अपितु राज्यों के हित में भी इन शक्तियों का उपयोग करते हैं। दूसरे, यदि उन्होंने ऐसा किया तो इससे संघीय योजना की प्रकृति में परिवर्तन नहीं हो सकता। जो व्यक्ति यह सोचते हैं कि नामाकंन से निर्वाचन तक राज्य के प्रतिनिधित्व की पद्धति में परिवर्तन संघ को कम आपत्तिजनक बनाएगा, उनसे मैं यह कहना चाहता हूं कि वे मामले के विवरण की ओर अधिक ध्यान दे रहे हैं, जब कि यह मामला आधारभूत है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आधारभूत क्या होता है और आधारभूत क्या नहीं होता। इस बारे में कोई भूल नहीं होनी चाहिए और इस बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। हमने इन दोनों स्थितियों के बारे में पर्याप्त जान लिया है। असली प्रश्न उत्तरदायित्व का विस्तार और उसकी समृद्धि का है। क्या यह संभव है? यही मूल प्रश्न है। हमें यह भी महसूस करना चाहिए कि प्रांतीय स्वायत्तता से चिपके रहने और केन्द्र में उत्तरदायित्व के प्रश्न को लटकाए रखने से कोई लाभ नहीं है। मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि केन्द्र में वास्तविक उत्तरदायित्व के बिना प्रांतीय स्वायत्तता सारहीन है।
हमें अपने दृष्टिकोण पर बल देना चाहिए। इस संबंध में विचार - विमर्श करने के लिए यह उचित स्थान नहीं है। यदि मैंने आपको इस संघीय योजना के खतरों के बारे में सम्यक विचार देने में सफलता पाई है तो यह पर्याप्त है।