संघ बनाम स्वतंत्रता
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यदि रानाडे का भारत कम उत्तेजित था तो वह अधिक ईमानदार था, यदि रानाडे का भारत कम आशा रखता था तो वह अधिक प्रबुद्ध था। रानाडे युग ऐसा युग था, जिसमें पुरुष और महिलाएं अपने जीवन के तथ्यों के अध्ययन और जांच करने में गंभीरता से व्यस्त थे और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि रुढि़वादी जनसमूह के विरोध में उन्होंने अपने जीवन और चरित्र को ऐसा स्वरूप दिया जो उस दृष्टिकोण के अनुसार था, जिसे उन्होंने अनुसंधान के फलस्वरूप प्राप्त किया था। रानाडे के युग में राजनीतिज्ञ और विद्यार्थी के बीच में संबंध विच्छेद नहीं था, जैसा कि गांधी युग में पाया जाता है। रानाडे के युग में यदि कोई राजनीतिक विद्यार्थी नहीं था तो उसे अवांछित व्यक्ति माना जाता था, चाहे उसे खतरा न समझा जाए। श्री गांधी के युग में सीखने की प्रवृत्ति को यदि हेय नहीं समझा जाता है तो निश्चय ही उसे राजनीतिज्ञ की आवश्यक योग्यता नहीं माना जाता है।
मेरे विचार से इसमें कोई संदेह नहीं है कि गांधी युग भारत का अंधकार युग है। यह ऐसा युग है, जिसमें लोग भविष्य में अपने आदर्शों को फलीभूत देखने की बजाए पुरावशेष की ओर लौट रहे हैं। यह ऐसा युग है, जिसमें लोगों ने अपने बारे में विचार करना बंद कर दिया है और चूंकि उन्होंने विचार करना बंद कर दिया है, इसलिए उन्होंने अपने जीवन के तथ्यों का अध्ययन और उनकी जांच करना भी बंद कर दिया है। अनभिज्ञ लोकतंत्र के भाग्य के बारे में विचार करना शोचनीय है, क्योंकि ऐसा लोकतंत्र विद्वता और अनुभव द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण नहीं करता है और रहस्यवादियों तथा महत्वाकांक्षियों के अंधकारपूर्ण मार्ग में टटोल कर चलना पसंद करता है। मैंने यह विचार किया कि संघीय योजना की केवल विवरणात्मक रूपरेखा देने से कहीं अच्छा है कि इस युग का मूल्यांकन किया जाए। इसको ऐसे उपचार की आवश्यकता है, जो पूर्ण होते हुए भी लंबा नहीं है, जो सही होते हुए भी हठधर्मी नहीं है; ताकि इसको संघीय योजना के उद्घाटन से उत्पन्न होने वाले खतरों के प्रति सचेत कर दिया जाए। यही कार्य है, जिसे मैंने अपने भाषण को तैयार करने में विचार बिंदु बनाया है। क्या मैं इस कार्य में असफल या सफल रहा? यह बात आपके सोचने, समझने और कहने के लिए है। यदि यह भाषण लंबा है और इस कमी को विचारों की गहनता से पूरा नहीं किया गया है तो मैं केवल यह कह सकता हूं कि मैंने अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभव से अपने कर्त्तव्य को निभाने का प्रयास किया है।
मैं संघीय सरकार का विरोधी नहीं हूं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने एकल सरकार के लिए पक्षपात किया है। मेरा विचार है कि भारत को इसकी आवश्यकता है। परंतु मैं यह महसूस करता हूं कि संघीय सरकार अनिवार्य है, यदि प्रांतीय स्वायत्तता दी जाती है। परंतु मैं भारत सरकार अधिनियम में दी गई संघीय योजना से अधिक भयभीत हूं। मैंने पर्याप्त कारण देकर अपने विरोध का औचित्य सिद्ध किया है। मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात की जांच करें और अपने निष्कर्षों पर पहुंचें। फिर भी, हमें यह मसहूस