3. सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय - Page 142

सांप्रदायिक गतिरोध
और
उसके समाधन के उपाय

अध्यक्ष महोदय,

मैं वास्तव में आपका अत्यंत आभारी हूं कि आपने मुझे अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ के वार्षिक अधिवेशन को संबोधित करने के लिए आमंत्रित करने की कृपा की। मुझे अनुसूचित जातियों के इस विशाल जनसमूह को यहां देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई है। यह देखते हुए कि इस परिसंघ की स्थापना को अभी कुछ ही समय हुआ है, परिसंघ का यह विकास हर दृष्टि से अद्भुत है। भारत - भर की अनुसूचित जातियां इस संघ में सम्मिलित हुई हैं और यह बात निर्विवाद है कि लोगों का यह पक्का इरादा है कि वे इस संघ को ही अपना प्रतिनिधि संगठन बनाएंगे। इस संघ का इतने कम समय में जो विस्तार हुआ है, उसका तब तक अनुमान नहीं किया जा सकता, जब तक कि हमारे संगठन के मार्ग में आने वाली जबरदस्त कठिनाइयों को भली प्रकार न समझ लिया जाए। अन्य राजनीतिक संगठनों के कुछ ऐसे एजेंट हैं, जो हमारे लोगों को झूठे प्रलोभन देकर उनसे झूठे वायदे करके और झूठे प्रचार से उन्हें फुसलाते रहते हैं। यह हमारे अपने ही लोगों की अज्ञानता है, जो उस संकट - काल को नहीं जानते, जिसमें हम रह रहे हैं और वे यह भी नहीं जानते कि हमारे राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संगठन का कितना महत्व है। हमारे पास जो साधन हैं, वे बहुत ही कम हैं। हमारे पास धन नहीं है। हमारा अपना कोई समाचार - पत्र नहीं है। हमारे लोगों पर भारत - भर में आए दिन जो निर्मम अत्याचार होते हैं, उनका जिस प्रकार दमन किया जाता है, उसकी सूचना समाचार - पत्रों में नहीं छपती। यहां तक कि समाचार - पत्र हमारे सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से संबंधित विचारों को जान - बूझकर जनता के सामने नहीं आने देते और यह सब समाचार - पत्रों की सुसंगठित साजिश का नतीजा है। हमारे पास धन नहीं है कि हम कोई ऐसी व्यवस्था कायम कर सकें, जिससे अपने लोगों की सहायता की जाए और उन्हें शिक्षित किया जाए, आंदोलित किया जाए तथा उन्हें संगठित किया जा सके।

यही वे कठिनाइयां हैं, जिनसे हमें निपटना है। इन कठिनाइयों के बावजूद हमारे परिसंघ का इतना विस्तार होना हमारे ही उन लोगों के प्रयासों का परिणाम है, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और निस्वार्थ भावना के साथ समर्पित होकर अपने को इस संगठन