3. सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय - Page 143

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के निर्माण में लगाया है। मुझे विश्वास है कि आप यह चाहेंगे कि मैं बंबई नगर अनुसूचित जाति परिसंघ के अध्यक्ष श्री गणपति महादेव जाधव के कार्य की प्रशंसा में दो शब्द कहूं। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि उनमें अद्भुत संगठनात्मक क्षमता है। मुझे विश्वास है कि इस अधिवेशन की सफलता अधिकांशतः उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है और इस सफलता का श्रेय उन लोगों को भी जाता है, जो उनके सहयोगी रहे हैं।

साधारणतः ऐसी जनसभा में मुझे अनुसूचित जातियों की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं में से किसी पर भाषण देना चाहिए था और हमारे लोग भी यही चाहेंगे कि मैं किसी ऐसी ही समस्या पर बोलूं। परन्तु मेरा ऐसे सांप्रदायिक विषय पर भाषण देने का कोई इरादा नहीं है। मैं तो ऐसे विषय पर भाषण देना चाहूंगा, जा सामान्य है और जिसमें लोगों की व्यापक रुचि हो, जैसे कि भारत के भावी संविधान का आकार और स्वरूप।

मेरे लिए यह बता देना भी अनुचित न होगा कि मेरे इस निर्णय के क्या कारण हैं। फिलहाल अनुसूचित जातियों के आंदोलन का नेतृत्व करने तथा दिन - प्रतिदिन की इसकी समस्याओं का सामना करने का दायित्व मेरे कंधों पर नहीं है। मैं अपने कार्यभार के कारण इस कार्य से बाहर हूं, न ही इस भार को स्वीकार करने की मेरी कोई इच्छा है यही एक ऐसा कारण है जिससे मैं इस सांप्रदायिक विषय पर नहीं बोलना चाहता, जो केवल अनुसूचित जातियों से ही संबंधित है।

अनुसूचित जातियों पर प्रायः यह दोषारोपण किया जाता है कि वे स्वार्थी हैं और उनकी अपने में ही रुचि होती है तथा उनके पास देश की राजनीतिक समस्या के समाधान के लिए भी कोई रचनात्मक सुझाव नहीं है। यह आरोप झूठा है और यदि यह सच भी है तो अस्पृश्य ही ऐसे नहीं हैं जो इसके दोषी पाए जाएं। भारत के अधिसंख्य लोगों का यही हाल है कि वे रचनात्मक सुझाव नहीं देते। इसका कारण यह नहीं कि उन लोगों में रचनात्मक सुझाव देने की क्षमता नहीं है। सभी रचनात्मक विचार क्यों प्रकट नहीं हो पाते, इसका कारण यह है कि एक दीर्घकालीन और अनवरत प्रचार ने आम लोगों के मन में यह बात बैठा दी है कि कोई भी बात तब तक आदरभाव से नहीं देखी जानी चाहिए और स्वीकार नहीं की जानी चाहिए, जब तक कि वह बात कांग्रेस ने न उठाई हो। यही वह भावना है, जिसने इस देश के रचनात्मक विचार के स्रोतों को नष्ट कर दिया है। साथ ही, मेरा विचार है कि अनुसूचित जातियों के विरुद्ध लगाए गए इस आरोप का सकरात्मक ढंग से प्रतिवाद किया जाना चाहिए और यह दिखा देना चाहिए कि अनुसूचित जातियां देश की सामान्य राजनीति उन्नति के लिए रचनात्मक सुझाव देने में सक्षम हैं, जिन्हें यदि यह देश चाहे तो उन पर विचार कर सकता है। यह दूसरा कारण है जिसने मुझे इस अवसर पर सामान्य रुचि के विषय का चयन करने के लिए प्रेरित किया है।