सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 131
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समुदाय और उनके हित संविधान सभा की सीटों का कोटा
हिन्दू 77 51
मुसलमान 50 51 अनुसूचित जातियां 15 20 सिख 3 8 भारतीय ईसाई 2 7 आंग्ल भारतीय 1 2 यूरोपीय 6 1 आदिवासी जनजातियां 2 3 विशेष हित - 16 अन्य 2 1
158 160
सप्रू समिति ने संविधान सभा के गठन में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों की संख्या ही निर्धारित नहीं की, बल्कि इस समिति ने मुसलमानों को हिन्दुओं के बराबर स्थान देने का प्रस्ताव किया। इस विचलन के लिए समिति का तर्क यह है कि इस प्रस्ताव के प्रतिफल के रूप में उसने संविधान सभा में चुनाव के लिए आधार के रूप में संयुक्त चुनाव - पद्धति की मांग की है। इस संबंध में यह कहना चाहिए कि समिति ने क्रिप्स के प्रस्तावों को बिल्कुल गलत समझा है। क्रिप्स के प्रस्तावों में संयुक्त चुनाव - पद्धति की पहले ही व्यवस्था कर दी गई थी क्योंकि उनमें एक खंड इस प्रकार है - ‘प्रांतीय विधान - मंडलों के अवर सदनों के सदस्यों से एकल निर्वाचक - मंडल गठित होगा।’ इसी बात को दूसरे तरीके से इस प्रकार कहा जा सकता है कि चुनाव संयुक्त चुनाव - पद्धति द्वारा किया जाएगा। इससे एक पक्ष को तो बिना किसी शर्त के कुछ दे दिया गया है और ऐसा करके अन्य समुदायों के लिए संकट पैदा कर दिया गया है।
(4) क्रिप्स प्रस्ताव के अंतर्गत सभा का निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत तथा
मतदान से किया जाना था। सप्रू प्रस्ताव के अंतर्गत निर्णय उपस्थित सदस्यों
में से तीन चौथाई सदस्यों के बहुमत तथा मतदान से किया जाता है।
अब दोनों प्रश्नों पर फिर से विचार कर लिया जाए। प्रथम प्रश्न के संबंध में स्थिति क्या है? इसके बारे में कोई मत प्रकट करने के लिए पहले यह आवश्यक है कि प्रांतीय विधान सभाओं की सदस्यता का संप्रदाय आधारित वितरण जान लिया जाए। अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में उस स्थिति का संक्षिप्त सार दिया गया है।