सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 139
वर्ग सांप्रदायिक बहुसंख्यक वर्ग है, न कि राजनीतिक बहुसंख्यक वर्ग। इसी
अंतर के कारण इंग्लैंड में जो कल्पना उभरती है, उसे भारत की परिस्थितियां
में वैध परिकल्पना नहीं माना जा सकता।
(3) कार्यपालिका को विधान-मंडल में बहुमत वाली पार्टी की समिति नहीं होना
चाहिए। इसका इस प्रकार निर्माण किया जाना चाहिए कि इसका आदेश
विधानमंडल के बहुमत से ही नहीं लिया जाएगा, अपितु उसके अल्पमत से भी
लिया जायेगा।
(4) कार्यपालिका का स्वरूप गैर - संसदीय होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि
वह विधान-मंडल की समयावधि से पूर्व हटाई नहीं जा सकेगी।
(5) कार्यपालिका का संसदीय स्वरूप होने का अर्थ है कि कार्यपालिका के सदस्य
विधान-मंडल के सदस्यों में से चुने जाएंगे और उन्हें सदन में बैठने, बोलने,
मत देने तथा प्रश्नों के उत्तर देने का अधिकार होगा।
कार्यपालिका में स्थानों के भरने का तरीका
इस संबंध में नीचे दिए गए सिद्धांतों को अपनाने का प्रस्ताव करूंगा :
(1) सरकार का कार्यकारी अध्यक्ष होने के नाते प्रधानमंत्री को पूरे सदन का विश्वास
प्राप्त होना चाहिए।
(2) यदि मंत्रिमंडल में किसी अल्पसंख्यक वर्ग का कोई व्यक्ति प्रतिनिधित्व करता
है तो उसे विधान-मंडल में अपने समुदाय के सदस्यों का विश्वास प्राप्त होना
चाहिए, और
(3) मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को तब तक नहीं हटाया जाएगा, जब तक कि
भ्रष्टाचार अथवा देशद्रोह के आधार पर सदन में उस पर महाभियोग न लगाया
गया हो।
इन सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए मेरा प्रस्ताव है कि प्रधानमंत्री तथा बहुसंख्यक वर्ग के समुदाय के मंत्रिमंडल के सदस्यों का चुनाव पूरे सदन द्वारा एकल परिवर्तनीय मत द्वारा किया जाना चाहिए तथा मंत्रिमंडल में अलग - अलग अल्पसंख्यक वर्गों के प्रतिनिधियों का चुनाव विधान-मंडल के प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा एकल परिवर्तनीय मत द्वारा किया जाना चाहिए।
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यह सबसे कठिन प्रश्न है। अन्य सभी प्रश्न इस प्रश्न के समाधान पर निर्भर हैं। इसमें दो मुद्दे उठते हैं :
(1) प्रतिनिधित्व की संख्या, और
(2) निर्वाचन - क्षेत्र का स्वरूप।
प्रतिनिधित्व की संख्या