सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 145
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प्रस्तावों में विहित सिद्धांत
अब मैं उन सिद्धांतों को बताना चाहूंगा, जिनके आधार पर यह वितरण किया गया है। ये सिद्धांत इस प्रकार हैं :
(1) बहुसंख्यक वर्ग का शासन सैद्धांतिक रूप से असमर्थनीय और व्यवहार में
असंगत होता है। बहुसंख्यक वर्ग को प्रतिनिधित्व का सापेक्ष बहुसंख्यक समुदाय
स्वीकार किया जा सकता है, परंतु यह कभी भी पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर
सकता। *
(2) विधान-मंडल में बहुसंख्यक समुदाय को दिए जाने वाले प्रतिनिधित्व का सापेक्ष
बहुमत इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि बहुसंख्यक वर्ग सबसे छोटा अल्पसंख्यक
वर्गों की सहायता से अपना शासन स्थापित कर ले।
(3) सीटों का वितरण इस प्रकार होना चाहिए कि बहुसंख्यक वर्ग तथा प्रमुख
अल्पसंख्यक वर्गों में से कोई वर्ग मिलकर उसे इतना बहुमत न दे दें कि वह
अल्पसंख्यक वर्ग के हित के प्रति सर्वथा उदासीन हो जाए।
(4) वितरण ऐसा होना चाहिए कि यदि सभी अल्पसंख्यक वर्ग मिल जाएं तो वे
बहुसंख्यक वर्ग पर आश्रित हुए बिना अपनी सरकार बना सकें।
(5) बहुसंख्यक वर्ग से ली गई वरीयता को अल्पसंख्यक वर्गों में उनकी सामाजिक
स्थिति, आर्थिक स्थिति और शैक्षिक दशा के विपरीत अनुपात में वितरित किया
जाना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यक वर्ग को, जो बड़ा है और जिसकी सामाजिक,
शैक्षिक और आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है, उस अल्पसंख्यक वर्ग की
अपेक्षा कम वरीयता मिलती है, जिसकी संख्या कम है और जिसकी शैक्षिक,
आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति अन्य वर्गों की अपेक्षा घटिया होती है।
यदि मैं ऐसा कहूं कि प्रतिनिधित्व संतुलित प्रतिनिधित्व है, तो कोई भी समुदाय ऐसी स्थिति में नहीं रहता कि वह अपने सदस्यों की अधिक संख्या के कारण अन्य समुदायों पर अपना आधिपत्य जमाए। मुसलमानों की हिन्दू बहुसंख्यक वर्ग के प्रति शिकायत तथा हिन्दू और सिखों की मुसलमानों के बहुसंख्यक वर्ग के साथ शिकायत केन्द्र और प्रांतों में पूर्णतः समाप्त की जा चुकी है।
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| Col1 | Col2 | Col3 |
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क्षेत्र की प्रकृति
निर्वाचन - क्षेत्रों के प्रश्न के बारे में आगे दी गई प्रस्थापनाएं स्वीकार की जानी चाहिएंः
* मैंने उत्तर - पश्चिमी सीमा प्रांत के लिए प्रतिनिधित्व की कोई भी योजना तैयार नहीं की है, क्योंकि अल्पसंख्यक
वर्ग इतना छोटा है कि सापेक्ष बहुसंख्यक वर्ग का सिद्धांत भी उस पर लागू नहीं हो सकता।