3. सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय - Page 163

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

(1) किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्र अथवा पृथक

निर्वाचन - क्षेत्र केवल निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के साधन का मामला है। यह कोई

सैद्धांतिक मामला नहीं है।

(2) इसका उद्देश्य यह है कि अल्पसंख्यक वर्ग को विधान-मंडल के लिए ऐसे

उम्मीदवारों का चयन करने के योग्य बना दिया जाए, जो वास्तविक होंगे और

अल्पसंख्यक वर्ग के नाममात्र के प्रतिनिधि नहीं होंगे।

(3) यदि एक ओर पृथक निर्वाचन - क्षेत्र अल्पसंख्यक वर्ग को इस बात की पूर्ण गांरटी

देता है कि उसके प्रतिनिधि केवल वही होंगे जिन्हें उसका विश्वास प्राप्त है, तो

दूसरी ओर निर्वाचन - क्षेत्र प्रणाली में अल्पसंख्यक वर्गों को समान संरक्षण प्रदान

किया जाता है। अतः इसकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए।

(4) इसे संभावित विकल्प समझा जा सकता है कि चार सदस्यों के निर्वाचन - क्षेत्र

में अल्पसंख्यक वर्ग को दोहरा मत प्राप्त करने का अधिकार हो, बशर्ते कि उसे

अलपसंख्यक वर्ग के मतों का न्यूनतम प्रतिशत प्राप्त हो।

वे मामले जिनके बारे में चर्चा नहीं की गई
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विशेष सुरक्षा का प्रश्न

कुछ अल्पसंख्यक वर्गों की ओर से की गई अन्य मांगें इस प्रकार हैं :

(1) अल्पसंख्यक वर्गों की दशा के संबंध में जानकारी देने के लिए कानूनी अधिकारी

की व्यवस्था,

(2) शिक्षा के लिए राज्य सहायता की कानूनी व्यवस्था, और

(3) भूमि बंदोबस्त के लिए कानूनी व्यवस्था। परंतु उनका स्वरूप सांप्रदायिक न हो।

अतः मैं उनके बारे में यहां विस्तार से चर्चा करना नहीं चाहूंगा।

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आदिवासी जनजातियां

यह स्पष्ट है कि मैंने प्रस्तावों में आदिवासी जनजातियों को शामिल नहीं किया है, यद्यपि उनकी संख्या सिखों, आंग्ल भारतीयों, भारतीय ईसाइयों और पारसियों से अधिक है। मैं कारण बताना चाहता हूं कि मैंने अपनी योजना में उन्हें क्यों शामिल नहीं किया है। आदिवासी जनजातियों ने अभी तक ऐसी राजनीतिक सूझबूझ हासिल नहीं की है, जिससे वे अपने राजनीतिक अवसरों का सर्वोत्तम उपयोग कर सकें। वे आसानी से बहुसंख्यक वर्ग अथवा अल्पसंख्यक वर्ग के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और इस प्रकार वे न केवल संतुलन बिगाड़ देते हैं, बल्कि अपना भी कोई भला नहीं कर पाते। उनके विकास की