सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 151
की ‘दैवी उलझन’ थी। चाहे यह बात जर्मनी के लिए सत्य हो अथवा असत्य, लेकिन मुझे यह लगता है कि यह भारत की वर्तमान परिस्थितियों का बहुत सही वर्णन है। जर्मनी तो इस उलझन से उबर गया। ऐसा भले ही एक बार में न हुआ हो, किंतु लगातार प्रयत्न होते रहे और युद्ध आरंभ होने से पूर्व जर्मनी उन लोगों का देश बन गया, जो एकता के सूत्र में बंधे थे वे अपने विचार में एक थे, वे अपने दृष्टिकोण में एक थे तथा समान भाग्य में अपने विश्वास में एक थे। भारत ने अभी तक अपनी उलझन से उबरने में सफलता नहीं प्राप्त की है। ऐसा नहीं है कि उसे ऐसा करने के लिए अवसर न मिला हो। वास्तव में ऐसे अनेक अवसर आए हैं। पहला अवसर 1927 में मिला था, जब लॉर्ड बर्किनहेड ने भारतीयों को चुनौती दी थी और उनसे कहा था कि वे भारत का संविधान तैयार करें। वह चुनौती स्वीकार कर ली गई। एक समिति का गठन किया गया, ताकि संविधान को तैयार किया जाए। एक संविधान तैयार किया गया और उसे ‘नेहरू संविधान’ की संज्ञा दी गई। परंतु भारतीयों ने इसे स्वीकार नहीं किया और जब उसे समाप्त कर दिया गया तो किसी ने आंसू नहीं बहाए। दूसरा अवसर भारतीयों को 1930 में दिया गया, जब वे गोलमेज सम्मेलन में एकत्र हुए थे। इस बार भी भारतीय अपने संविधान की विचरना करने की भूमिका अदा करने में असफल रह गए। एक तीसरा प्रयास अभी हाल में सप्रू समिति द्वारा किया गया। इस समिति के प्रस्ताव भी असफल रहे।
अब एक और प्रयास के लिए न तो उत्साह है और न आशा। लोग भाग्यवादी हो गए हैं, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक प्रयास जब असफल ही होना है, तो प्रयास करने की आवश्यकता ही क्या है? साथ ही मैं महसूस करता हूं कि किसी भी भारतीय को इतना हतोत्साहित अथवा इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि यह गतिरोध ऐसा बदबूदार हो जाए, जैसे कि कोई मरा हुआ कुत्ता, और कोई यह कहे कि वह राजनीतिक युद्ध को, जो देश में हो रहा है, उसे एक दर्शक की तरह देखने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। गत वर्षों की असफलताओं से किसी भी व्यक्ति को निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। मैं यह महसूस करता हूं कि यद्यपि यह सत्य है कि सांप्रदायिक प्रश्न पर समझौता करने के सभी प्रयास असफल हो गए हैं, किन्तु इस असफलता का कारण भारतीयों का जन्मजात दोष नहीं है, अपितु त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण इस असफलता का कारण है। मैं आश्वस्त हूं कि यदि मेरे प्रस्तावों पर निष्पक्ष भाव से विचार किया जाए तो वे प्रस्ताव स्वीकार्य होंगे। इन प्रस्तावों में एक नया दृष्टिकोण है और इसलिए मैं अपने देशवासियों से इनकी सिफारिश करता हूं।
इससे पूर्व कि मैं अपना भाषण समाप्त करूं मैं अपने आलोचकों को यह चेतावनी देना चाहता हूं कि वे मेरे प्रस्तावों में कुछ हद तक संशोधन कर सकते हैं, परंतु उनके लिए यह आसान नहीं है कि वे इन्हें रद्द कर दें। यदि वे इन्हें रद्द करना ही चाहें तो उन्हें पहले उन सिद्धांतों का खंडन करना होगा, जिन पर ये आधारित हैं।