150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
उनसे बहुमत के शासन के सिद्धांत की पुष्टि की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
राजनीति में बहुमत शासन का सिद्धांत त्याग देने से हिन्दुओं के जीवन के अन्य पक्षों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। सामाजिक जीवन के एक तत्व के रूप में वे बहुमत में ही रहेंगे। उनका व्यापार और वाणिज्यि का एकाधिकार होगा, जिसका वे लाभ उठाते हैं। उन्हें उस संपत्ति का एकाधिकार होगा, जो उनके पास है। मेरे प्रस्तावों में यह नहीं है कि वे सर्वसम्मति के सिद्धांत को स्वीकार करे। मेरे प्रस्तावों में यह भी नहीं है कि हिन्दू बहुमत के शासन के सिद्धांत का परित्याग कर दें। मै। उनसे केवल यही कहता हूं कि वे सापेक्ष बहुमत से संतुष्ट हो जाएं। क्या उनके लिए यह बात इतनी भारी है कि वे इसे स्वीकार न कर सकें?
ऐसे बलिदान के बिना बहुसंख्यक विश्व में कहीं भी यह कहने का औचित्य नहीं रखते कि अल्पसंख्यक भारत की स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक बने हुए हैं। यह मिथ्या प्रचार काम नहीं आएगा, क्योंकि अल्पसंख्यक ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं। वे स्वतंत्रता और उसमें जो खतरे हैं उसे झेलने के लिए तैयार हैं, किन्तु शर्त यह है कि उन्हें संतोषजनक सुरक्षा दी जाए। अल्पसंख्यक वर्ग का यह संकेत एक ऐसा मामला न समझा जाए, जिसके लिए हिन्दुओं को कृतज्ञ होने की आवश्यकता नहीं है। इसकी तुलना आयरलैंड में घटित घटना से करनी चाहिए। आयोग राष्ट्रवादियों के नेता श्री रेडमांड ने अल्स्टर के नेता श्री कार्सन से एक बार कहा थाः ‘संयुक्त आयरलैंड के लिए समहति दें। आप जिस प्रकार की सुरक्षा की मांग करें, वह आपको दी जाएगी।’ यह कहा जाता है कि उन्होंने मुड़कर कहा : ‘धिक्कार है आपकी सुरक्षा पर, हम नहीं चाहते कि आप हम पर शासन करें।’ भारत के अल्पसंख्यक वर्ग ने ऐसा नहीं कहा है। वे सुरक्षा के साधनों से संतुष्ट हैं। मैं हिन्दुओं से पूछना चाहता हूं कि क्या यह संतोष का विषय नहीं है? मुझे विश्वास है कि यह ऐसा ही है।
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मेरे मस्तिष्क में सांप्रदायिक समस्या के समाधान के लिये कुछ विचार हैं। वे अखिल भारतीय अनुसूचित जातियों के संघ को वचनबद्ध नहीं करते। मैं भी इन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं हूं। मैं उनका उल्लेख केवल इसलिए कर रहा हूं कि संभव है इससे कोई नया रास्ता निकल आए। मेरा बल विशेष रूप से उस सिद्धांत पर है जो मैंने प्रतिपादित किया है, वास्तविक प्रस्तावों पर नहीं। यदि सिद्धांत स्वीकार कर लिए जाते हैं तो मुझे विश्वास है कि सांप्रदायिक प्रश्न का समाधान इतना दुष्कर नहीं रहेगा, जितना गत वर्षों में रहा है।
भारतीय गतिरोध के समाधान की समस्या सरल नहीं है। मुझे याद है कि मैंने एक इतिहासकार की यह बात पढ़ी थी कि 1867 के महासंघ से पूर्व जर्मनी की दशा एक तरह