प्रस्तावना
जब यह निश्चित हो गया कि भावी भारत का संविधान तैयार करने का कार्य संविधान सभा को सौंपा जाने वाला है, तो उसके बाद अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ की कार्य समिति ने मुझसे कहा कि मैं अनुसूचित जातियों के सुरक्षोपायों के विषय में एक ज्ञापन तैयार करूं, जिसे परिसंघ की ओर से संविधान सभा में प्रस्तुत किया जाए। मैंने सहर्ष यह काम अपने हाथ में ले लिया। मैंने जो कुछ श्रम किया, उसके परिणाम इस विवरण - पुस्तिका में उल्लिखित हैं।
इस ज्ञापन में मूल अधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और अनुसूचित जातियों के सुरपोक्षोपायों की परिभाषा दी गई है। जिन लोगों का यह विचार है कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं, वे यह कह सकते हैं कि मैंने निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण किया है। यह धारणा कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं, उच्च और शक्तिसंपन्न हिन्दू बहुसंख्यक की ओर से जारी की गई एक नई व्यवस्था है और अनुसूचित जातियों से कहा जाता है कि वे इस बात को मानकर चलें। लेकिन बहुसंख्यक वर्ग के प्रवक्ता ने इसकी व्याप्ति और इसका अर्थ नहीं बताया है। नवीन एवं स्वतंत्र विचारों वाला कोई भी व्यक्ति इसे सामान्य प्रस्ताव के रूप में देखते हुए जब यह कहेगा कि इसके दो निर्वचन किए जा सकते हैं, तो ऐसा कहना न्यायोचित होगा। मैं इसका निर्वचन यह करता हूं कि अनुसूचित जातियों की दशा अल्पसंख्यकां से भी खराब है और नागरिकों तथा अल्पसंख्यकों को जो भी संरक्षण दिए जाएंगे, वे अनुसूचित जातियों के लिए पर्यापत नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, इसका अभिप्राय यह है कि अनुसूचित जातियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति अन्य नागरिकों और अल्पसंख्यकों की तुलना में इतनी खराब है कि उन्हें उस संरक्षण के अलावा जिसे वे नागरिकों तथा अल्पसंख्यकों के नाते प्राप्त करेंगे, बहुसंख्यकों के अत्याचार और भेदभाव के विरुद्ध विशेष सुरक्षोपायों की जरूरत होगी। दूसरा निर्वचन यह है कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यकों से भिन्न हैं। अतः वे उस संरक्षण के लिए हकदार नहीं हैं, जिनका दावा अल्पसंख्यकों द्वारा किया जाए। यह निर्वचन मूर्खतापूर्ण दिखाई पड़ता है और किसी भी विवेकशील व्यक्ति को इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। यदि अनुसूचित जातियां इस निर्वचन को स्वीकार न करें तो उन्हें क्षमा प्रदान की जाए। जो लोग मेरे इस निर्वचन को स्वीकार करते हैं कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं वे, मुझे यकीन है, मेरे इस विचार से सहमत होंगे कि अनुसूचित जातियों के लिए मेरी यह मांग औचित्यपूर्ण है कि उन्हें नागरिकों के मूल अधिकारों की समस्त सुविधाएं, अल्पसंख्यकों की रक्षण संबंधी समस्त सुविधाएं दी जाएं और साथ ही उनके लिए विशेष सुरक्षोपाय किए जाएं।