156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यह ज्ञापन संविधान सभा में प्रस्तुत किया जाना था। इसे सार्वजनिक रूप से जारी करने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन मेरे सवर्ण हिन्दू मित्रों ने मुझसे आग्रह किया कि इस ज्ञापन को व्यापक रूप से प्रचारित किया जाए। उन मित्रों को इसकी टंकित प्रति पढ़ने का मौका मिल गया था। यद्यपि यह संविधान सभा के सदस्यों के लिए है, फिर भी इसे जनसाधारण के लिए सुलभ कराने में मुझे कोई अनौचित्य दिखाई नहीं पड़ता। अतः मैं उनकी बात मानने के लिए राजी हो गया हूं।
अपने विचारों का उल्लेख सामान्य भाषा में करने की बजाए मैंने इस ज्ञापन का प्रारूप संविधान के अनुच्छेदों के रूप में तैयार किया है। मुझे विश्वास है कि सुनिश्चितता और सुस्पष्टता की दृष्टि से यह तरीका अधिक सहायक सिद्ध होगा। अनुसूचित जाति परिसंघ की कार्यकारणी की सुविधा के लिए मैंने कुछ व्याख्यात्मक टिप्पणियां और अन्य आंकड़े भी तैयार किये थे। चूंकि ये टिप्पणियां और आंकड़े सामान्य पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे, अतः मैंने इन्हें ज्ञापन के साथ - साथ छपवाना बेहतर समझा।
संविधान सभा के समक्ष अनेक समस्याएं आएंगी। उनमें से दो निश्चित रूप से अत्यंत जटिल हैं। पहली समस्या है अल्पसंख्यकों की और दूसरी है देशी राज्यों की। मैं देशी राज्यों की समस्या का छात्र रहा हूं। इस विषय पर मेरे कुछ निश्चित और स्पष्ट विचार हैं। मुझे आशा थी कि संविधान सभा मुझे देशी राज्यां की समिति के लिए चुनेगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस कार्य के लिए प्रतिभाशाली व्यक्ति मिल गए हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि चूंकि मैं उनके खेमे से बाहर का व्यक्ति हूं, अतः अवांछनीय हूं। शामिल न किए जाने पर मुझे कोई अफसोस नहीं है। मुझे खेद इसलिए है कि मैं उस अवसर से वंचित रह गया हूं, जिसकी मैं समिति के समक्ष अपने विचार पेश करने के लिए आशा कर रहा था। अतः अब मैंने यही उचित समझा है कि नागरिकों, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जातियों के अधिकारियों के साथ - साथ उन्हें इस विवरणिका में शामिल करूं, ताकि अधिक से अधिक लोग उनका वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकें और उचित मूल्यांकन कर सकें तथा उनका उसी ढंग से इस्तेमाल कर सकें, जिसे वे उपयुक्त समझें।
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| vEcsMdj | Col2 | Col3 | Col4 |
|---|---|---|---|
| vEcsMd |
राजगृह
दादर, बंबई - 14
15 - 3 - 47