1 कृषि का महत्व
जीवन - निर्वाह के आर्थिक तरीकों का अध्ययन सदा ही महत्वपूर्ण होता है। ये तरीके या तो उद्योगों का रूप ले लेते हैं या सेवाओं का। हम यहां पर केवल उद्योगों पर ध्यान दे रहे हैं। इन्हें मुख्य और पूरक, दो भागों में बांटा जा सकता है। मुख्य उद्योग पृथ्वी, धरती और जल से उपयोगी सामग्री उपार्जित करते हैं, जैसे शिकार आदि, मछली पकड़ना, पशु - पालन, लकड़ी काटना और खनन। ये मुख्य या निष्कर्षणीय उद्योग दो प्रकार से बुनियादी होते हैंः (1) ये प्रकृति से उपयोगी सामग्री प्राप्त करते हैं, जो मनुष्य के निर्वाह की मूल स्रोत बन जाती है, और (2) वे पूरक या निर्माण उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं, क्योंकि औद्योगिक निर्माण, डा. फ्रेंकलिन के शब्दों में, ‘पदार्थ का केवल रूप ही परिवर्तित होता है।’ राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी, मुख्य उद्योगों का महत्व असंदिग्ध है। मुख्य उद्योग महत्वपूर्ण तो हैं ही, परंतु इन सबमें कृषि अधिक महत्वपूर्ण है। यह सबसे प्राचीन उद्योग है और अन्य सभी उद्योग, चाहे मुख्य हों या गौण, इस पर आधारित हैं। क्योंकि यह उद्योग अनाज के उत्पादन से संबंधित है, इसलिए इसकी समस्याओं पर हमें सबसे अधिक गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। परंतु भारत जैसे देश में, जो पूरी तरह कृषि पर निर्भर करता है, वहां तो इसके महत्व पर अधिक जोर देने की आवश्यकता ही नहीं है। कृषि उत्पादन से संबंधित कृषि अर्थव्यवस्था की समस्याएं होती हैं-क्या पैदा किया जाए, उत्पादन कारकों का उचित अनुपात, जोतों का आकार, भूमि की पट्टेदारी, आदि। इस लेख में केवल जोतों के आकार की समस्या पर विचार किया गया है, क्योंकि इसका कृषि की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है। भारत में छोटी जोतें
यह कहा जा सकता है कि कुछ देशों में जोतें मुख्यतः छोटे आकार की होती हैं, जब कि अन्य देशों बड़े आकार की। एड्म स्मिथ के अनुसार, मुख्यतया जब सैनिक जीवन की अनिर्वायता के कारण ज्येष्ठ पुत्र को अधिकार प्रदत्त करने का नियम अपनाया गया तो बड़ी जोतों की रचना और संरक्षण शुरू हुआ। जब राष्ट्र में अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण स्थिति के कारण समान उप - विभाजन किया जाता है तो उससे छोटी जोतें अस्तित्व में आती हैं। एडम स्मिथ ने कहा है :
जब भूमि को अन्य चल-वस्तुओं की भांति निर्वाह और खुशी मनाने का साधन मात्र
माना जाता है, तब उत्तराधिकार का स्वाभाविक कानून इसे परिवार के सब बच्चों