भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 233
एक और जांच - पड़ताल डॉ. एच. एस. मान और उनके सहयोगियों द्वारा पूना के निकट पिम्पपाला सौदागर नामक गांव में की गई थी, जिससे खासकर छोटी जोतों की सही स्थिति का पता चलता है। उस गांव की इन जोतों के आकार नीचे दी गई सारणी में दिए गए हैं ख्4, :
प्रत्येक आकार की प्रत्येक आकार की
जोतों की संख्या जोतों की संख्या
20 एकड़ से अधिक 1 10 से 20 एकड़ 7 5 से 10 एकड़ 21 3 से 5 एकड़ 25 2 से 3 एकड़ 67 1 से 2 एकड़ 164 30 से 40 गुंठा 75 20 से 30 गुंठा 136 15 से 20 गुंठा 71 10 से 15 गुंठा 57 5 से 10 गुंठा 59 5 से कम 25
(40 गुंठा = 1 एकड़)
टिप्पणी - इस सारणी में बहुलक जोत आकार एक और दो एकड़ के बीच है। बहुलक उस सांख्यिकीय औसत को कहते हैं जिसमें आवृत्ति की संख्या सर्वाधिक होती है।
इन सारणियों से आसानी से पता चलता है कि जोत का औसत आकार बंबई प्रेसिडेंसी में 25.9 एकड़ है, तो पिम्पाला सौदागर में यह एक और दो एकड़ के बीच है।
कहा जाता है कि जोतों का अत्यधिक छोटा आकार भारतीय कृषि के लिए बहुत हानिकारक है। निस्संदेह छोटी जोतों में बहुत - सी बुराइयां होती हैं। पर यदि वे छोटी जोतें संयत हों तो इनकी बहुत - सी बुराइयां कम हो जाएं। परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा है नहीं। यद्यपि लगान की दृष्टि से भूमि के सभी टुकउ़ों को किसान की एक ही जोत माना जाता है, परंतु काश्तकारी की दृष्टि से वे कई अलग - अलग छोटे - छोटे जमीन के टुकड़े होते हैं, जिनके बीच में अन्य लोगों की जमीन के टुकड़े आते हैं। जोत कितने टुकड़ों में बिखरी हुई होती है, यह केवल कागज पर नक्शा बनाकर दिखाया जा सकता है। पर चूंकि हम नक्शा नहीं दे सकते, इसलिए हमें इसी जानकारी से संतोष करना पड़ेगा कि एक जोत में भूमि के कितने टुकड़े हैं। हर जोत में जमीन के टुकड़ों की संख्या से पता चलेगा कि वह कितनी ज्यादा विखंडित है। प्रश्न के इस पहलू पर प्रभाव डालने के लिए हमारे पास भारत के आंकड़े नहीं हैं। परंतु मानीय जी. एफ. कीटिंग ने 1916 में सरकार को दिए गए अपने एक नोट ख्5, में बंबई प्रेसिडेंसी के सभी जिलों के कुछ मामलों के बारे में आंकड़े एकत्र किए थे। ये आंकड़े सुबोधता की दृष्टि से आगे सारणी में दिए गए हैं :
लैंड एंड लेबर इन ए डेक्कन विलेज, 1927, पृष्ठ 48
लेखक इस महत्वपूर्ण नोट के लिए आभारी है।