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भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण

इंग्लैंड

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और जर्मनी सं. रा. अमरीका फ्रांस भारत

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1871
38-20 61-80
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32-1 67-9
1891
27-95 72-05
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23-00 77-00
1911
19-9 78-1
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- - 47
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(विभिन्न देशों के आंकड़े उल्लिखित वर्ष के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि तीन वर्षीय अवधि के बीच के हैं)।

सर राबर्ट गिफिन विभिन्न देशों की आर्थिक प्रवृत्तियों का सर्वेक्षण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे :

मनुष्य की आवश्यकताएं उनके साधनों के हिसाब से बढ़ती हैं, जिस अनुपात में

लोग, कृषि, खनन और वैसे ही धंधों में लगे हुए होते हैं, वहां उसी अनुपात में वह

कम होती जाती हैं। और जिस अनुपात में लोग उद्योग में, अर्थात् निर्माण - कार्यों में

लगे रहते हैं, वहां उनकी आवश्यकता बढ़ती जाती है। ख्28,

परंतु भारत के आंकड़े इस सिद्धांत के विपरीत जाते हैं और एक विशेषज्ञ को इनमें एक विश्वव्यापी प्रवृत्ति की झलक देते हैं। जहां सं. रा. अमरीका जैसे देश जो प्रारंभ में कृषि - प्रधान देश थे, अब क्रमशः औद्योगिक देश बनते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत में दुर्भाग्यवश लोग शहरों को छोड़ते जा रहे हैं, और आवश्यकता न होने पर भी गांवों की ओर लोग भागे जा रहे हैं। जितनी जल्दी हम इस प्रवृत्ति को रोक दें, उतना ही अच्छा होगा। अपने मतलब के कारण लोग जो कुछ भी कहें, ख्29, इस संबंध में हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बारे में सर हेनरी काटन के इन शब्दों से अधिक सच और हितकारी

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  1. ऐसेज इन फाइनेंस, सैकिंड सिरीज, पृष्ठ 240

  2. प्रो. जेवन्स ने ‘कृषि में पूंजीवादी विकास’ संबंधी अपना प्रबंध बंबई में दिसंबर 1915 में भारतीय औद्योगिक

सम्मेलन के समक्ष पढ़ते हुए औद्योगीकरण के विरुद्ध तर्क दिए थे। तथापि प्रो. जेवन्स के विरुद्ध यह कहा जा

सकता है कि औद्योगीकरण की बदौलत ही पूंजीवादी कृषि संभव हो सकती है। उनके प्रबंध की त्रुटियां दूर करने

वाला है सर राबर्ट गिफेन का निबंध, जो उनके ऐसेज इन फाइनेंस, फर्स्ट सिरीज में प्रकाशित हुआ था।