साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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- लेकिन इस तर्क का मुख्य आशय यह है कि सामान्यतः हिन्दुओं तथा विशेषतः अस्पृश्य हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व पर विचार किया जाए। यह अच्छा होगा, यदि हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व पर चर्चा एक उद्धरंण से प्रारंभ की जाए जिसमें उस नई चेतना की बात कही गई है, जो विभिन्न हिन्दू वर्गों में उत्पन्न हुई है। इसमें कहा गया हैः
संरक्षण की अपेक्षा रखने वाले अलग हितों के आधार पर ही कोई समुदाय प्रतिनिधित्व
की मांग कर सकता है। भारत में ऐसे हित केवल तीन प्रकार के हैं : या तो वे धार्मिक
विद्वेष से उत्पन्न होते हैं जो भारत में काफी फैला हुआ है, या शिक्षा के क्षेत्र में किसी
समुदाय की पिछड़ी स्थिति से, या किसी समुदाय की सामाजिक - धार्मिक अशक्तताओं
से उत्पन्न होते हैं। हम स्वयं को हिन्दू समुदायों तक सीमित रखेंगे। कतिपय ऐसे
समुदाय हैं जो बहुत पिछड़े हुए तो हैं ही, साथ ही वे घोर सामाजिक अत्याचार की
चक्की में भी पिस रहे हैं। निश्चय ही परिषद हॉल में अस्पृश्य वर्गों के अपने ऐसे
आदमी होने चाहिएं, जो उनकी शिकायतों को दूर कराने के लिए संघर्ष कर सकें।
समूचा ब्राह्मणेत्तर वर्ग ब्राह्मण पुरोहित वर्ग के सामाजिक तथा बौद्धिक प्रभुत्व के अधीन
दासता भोग रहा है। अतः उसका पृथक प्रतिनिधित्व की मांग करना उचित है।
इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दुओं की नवचेतना जहां अस्पृश्यों के अलग हितों को स्वीकार करती है, वहां वह इस स्थिति को स्वीकार नहीं करती कि स्पृश्य हिन्दू स्वयं एक समूह का निर्माण करते हैं। नवचेतना का आग्रह है कि स्पृश्य समूह का विभाजन ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर वर्गों के रूप में किया जाए और प्रत्येक के अलग - अलग हित हों जिन तीन समूहों में हिन्दू बंटे हुए हैं, उनके लिए मिश्रित निर्वाचक - मंडलों में पृथक निर्वाचक - मंडलों अथवा आरक्षित सीटों की मांग की गई है। अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व की समस्याओं पर विचार करने से पहले मैं ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर वर्गों के बारे में कुछ कहना चाहूंगा।
ब्राह्मणेत्तर वर्ग ‘शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा है’, इसे किसी भी प्रकार से उसका विशेष हित नहीं किया जा सकता। यह तो सभी का, यहां तक कि उन ब्राह्मणों का भी सामान्य हित है, जो शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हैं। ‘ब्राह्मणों के बौद्धिक तथा सामाजिक प्रभुत्व’ का प्रभाव केवल ब्राह्मणेत्तर वर्ग पर ही नहीं पड़ता, बल्कि सभी पर पड़ता है। अतः यह सबका हित है। फिर ब्राह्मणेत्तर वर्ग का वह कौन - सा विशेष हित है, जिसका संरक्षण अपेक्षित है?
ब्राह्मणेत्तर वर्ग के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का औचित्य नहीं बनता, क्योंकि वे सिद्ध नहीं कर सकते कि उनका कोई सर्वसाझा हित है।
- लेकिन क्या उन्हें व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है? इसका विवरण आंकड़ों सहित अगले पृष्ठ पर दिया गया है :