10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इसके परिणाम से सावधानी से बचना लोकतंत्र के हित में होगा। विशेष रूप से कहा जाए तो केवल निर्वाचक होना ही काफी नहीं है। विधि - निर्माता होना भी आवश्यक है। अन्यथा विधि - निर्माता उन लोगों के स्वामी बन जाएंगे, जो केवल निर्वाचक होंगे।
अतः प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्रों पर इस आधार पर आपत्ति करना उचित है कि वे इस बेतुके परिणाम से बचने के लिए कुछ नहीं करते। वे यह मान लेने की गलती कर बैठते हैं कि निर्वाचक उम्मीदवारों के व्यक्तित्व का परवाह न करते हुए उनके कार्यक्रमों के आधार पर वोट देंगे। लेकिन वास्तविक बात यह है कि निर्वाचक, निर्वाचक होने के पूर्व मुख्यतः किसी समूह के सदस्य होते हैं। उम्मीदवारों के व्यक्तित्व का उनके लिए महत्व होता है। अतः यह स्वाभाविक है कि वर्ग के सदस्य होने के नाते वे उस उम्मीदवार को पसंद करते हैं, जो उनके वर्ग का होता है। वे उस उम्मीदवार को पसंद नहीं करते, जो उनके समूह का नहीं होता, भले ही ये दोनों समान हित का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हों। इस पसंद के कारण निश्चित है कि बड़े समूह के निर्वाचक अंततः विधि - निर्माता की उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेंगे, जब कि छोटे समूह के निर्वाचक बिना किसी कुसूर के केवल निर्वाचक की निम्न स्थिति में बने रहने के लिए बाध्य होंगे। लोकप्रिय सरकार का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह होता है कि उसमें हितों और विचारों का प्रतिनिधित्व होता है। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसमें व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व भी होता है। प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्र लोकप्रिय सरकार नहीं बना सकते हैं, क्योंकि वे छोटे समूहों के सदस्यों को व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व नहीं दिला सकते।
यदि यह सही विश्लेषण है कि किस प्रकार कुछ समुदायों के राजनीतिक जीवन के प्रतिकूल सामाजिक विभाजन कार्य करते हैं, तो इस स्थिति से निपटने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व का जो उपाय सुझाया गया था, उससे बढ़कर और कोई अनुचित उपाय नहीं हो सकता। आनुपातिक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य विचारों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व देना है। उसके अनुसार यह पहले से ही मान लिया जाता है कि निर्वाचक उम्मीदवार को उसके विचारों के आधार पर वोट देते हैं, न कि उसके व्यक्तित्व के आधार पर। अतः इस प्रस्तुत कार्य के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व उपयुक्त नहीं है।
अतः इस स्थिति से निपटने के लिए हमारे पास संभावित दो तरीके हैं। या तो बहुसंख्यक निर्वाचन - क्षेत्रों में उन अल्पसंख्यकों के लिए सीटें रिवर्ज कर दें जो अन्यथा प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सकते, अथवा संप्रदाय आधारित निर्वाचक - मंडल बना दें। दोनों की अपनी उपयोगिता है। जहां तक मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का संबंध है, यह अत्यंत वांछनीय है कि आम चुनावों में बहुसंख्यक निर्वाचन - क्षेत्रों में उनके लिए सीटें रिजर्व कर दी जाएं। हिन्दू तथा मुसलमान के विभाजन का कोण पहले ही बहुत तीक्ष्ण है और साग्रह निवेदन है कि संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व उसे और भी तीक्ष्ण बना देता है। जहां तक मुसलमानों का संबंध है, संप्रदाय आधारित निर्वाचन एक तयशुदा तथ्य प्रतीत होता है और उसमें परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है, भले ही परिवर्तन लाभप्रद हो।