6. श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण - Page 280

श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण

प्रिंसिपल्स ऑफ शोसल रिकंस्ट्रक्शन ख्1, नामक पुस्तक की रचना माननीय श्री बर्टेंड रसल ने की है और वह युद्ध के बारे में है। युद्धपरक साहित्य समग्रतः या तो युद्ध का प्रचार करता है या फिर उसका निवारण। श्री रसल की पुस्तक युद्ध - निवारण वर्ग की है। परंतु इस वर्ग की अन्य पुस्तकों से इस पुस्तक की अलग पहचान है और होनी भी चाहिए। युद्ध - निवारक संबंधी पुस्तकों में से कुछ में कहा गया है कि कुछ देशों को उनकी इच्छा के विरुद्ध उनके ‘निरंकुश विजेताओं ने भौगोलिक कांजी हाउसों अथवा बाड़ों में बंदी बना दिया है। यह न तो उचित है और न ही प्रकृतिसम्मत। अन्य पुस्तकों में तथा श्री ऐंजल की कृति ग्रेड इल्यूजन में यह बताने का प्रयास किया गया है कि युद्ध का अजब गणित है। विजेता जितना पाता है, उससे अधिक गंवाता है। फिर भी, श्री रसल का निदान नितांत भिन्न है। उनका विचार है कि उक्त प्रकार की तर्क - प्रधान अपीलों से युद्ध समाप्त नहीं किए जा सकते। उनका कहना है, ‘केवल तर्क के तीरों से युद्ध नहीं रोके जा सकते, अपितु युद्ध तो ऐसे आवेगों तथा संवर्गों के व्यवहार योग्य जीवन द्वारा रोके जा सकते हैं, जो उन मनोवेगों को शांत करें जो युद्ध भड़काते हैं। न केवल चेतन विवेक के स्तर पर, बल्कि संवेगों के स्तर पर भी जीवन में परिवर्तन होना चाहिए।’ ख्2, जैसा अनोखा है उनका निदान, वैसा ही अनोखा है उनका सामाजिक दर्शन। उनके मत के अनुसार, ‘युद्ध के द्वारा हमें मुख्यतः यह बात सीखनी है कि युद्ध मानवीय कर्म के उद्देश्यों के प्रति एक निश्चित दृष्टिकोण रहा है, यथा वे उद्देश्य क्या हैं और उनके बारे में हम समुचित रूप से आशा कर सकते हैं कि वे कैसे होंगे। यह दृष्टिकोण यदि सही हो तो लगता है कि वह संकट की घड़ी का सीना तानकर सामना करने के लिए अधिक सशक्त आधार राजनीतिक दर्शन के वास्ते प्रस्तुत कर सकता है, न कि परंपरागत उदारतावाद का दर्शन।’ ख्3,

इस रवैए के अनुरूप ही उन्होंने व्यवहारवादी मनोविज्ञान ख्4, का दृष्टिकोण अपनाया है। मनोविज्ञान के इस नए विकास का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उसमें माननीय कर्म के स्रोतों के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण का समावेश है। इसने इस सिद्धांत को उलट दिया है कि मनुष्य की उद्यमशीलता के लिए बाह्य परिस्थितियां उत्तरदायी हैं।

  1. लंदन : जार्ज एलेन एंड अनविन लिमिटेड, 1917

  2. प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 13

  3. वही, पृ. 9

  4. अच्छा होगा यदि श्री रसल के पाठक प्रो. ई.एल. थार्नडाइक की पुस्तक एजुकेशनल साइकोलाजी का अवलोकन

करें। देखिए खंड 1

आन द ओरिजिनल नेचर ऑफ मैन।