6. श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण - Page 281

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

व्यवहारवादी का कहना है कि यदि ऐसा होता है तो वह एक निष्क्रिय जीव का पूर्वानुमान रहता और जैविक दृष्टि से यह सच नहीं है। वह कहता है कि मानव के भीतर ही कर्म के स्रोत होते हैं, क्योंकि उसमें कर्म करने की कुछ जन्मजात प्रवृत्तियां होती हैं। बाह्य परिस्थितियां कर्म की प्रेरणा नहीं देतीं। वे तो केवल उसे पुनः दिशा प्रदान करती हैं। व्यवहारवादी आगे कहता है कि कर्म करने की ये प्रवृत्तियां व्यवहार में आते समय सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर रूप बदलती हैं। इन मूल प्रवृत्तियों में जो परिवर्तन होते हैं, वे सर्वाधिक महत्व के हैं। उन्हीं में शब्द के सर्वाधिक व्यापक अर्थ में शिक्षा (सीख) निहित होती है। किन्तु सभी परिवर्तन समान महत्व के नहीं होते और यह सुधारक का कार्य है कि वह उन परिस्थितियों तथा संस्थाओं का सफाया करे, जो समाज के अहित में प्रवृत्तियों का परिवर्तन करती हैं और उन प्रवृत्तियों की रक्षा तथा स्थापना करे, जो लोकहित में उनका परिवर्तन करती है। जो भी हो, इस बात का भारी सामाजिक महत्व है कि ये प्रवृत्तियां असीम परिवर्तन कर सकती हैं। श्री रसल के अनुसार, यह केवल इसलिए संभव है, ‘मानव के आवेग प्रारंभ से ही उनकी मूल प्रवृत्तियों द्वारा निश्चित नहीं किए जाते हैं। एक निश्चित सीमा के भीतर उसकी परिस्थितियां तथा उसकी जीवन - शैली उनमें भारी परिवर्तन करती हैं। इन परिवर्तनों की प्रकृति का अध्ययन किया जाए और जब राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं से होने वाले हित अथवा अहित का अंकन किया जाए तो अध्ययन के परिणामों को ध्यान में रखा जाए। ख्5,

छह ज्ञानवर्धक अध्यायों में में रसल ने उन परिवर्तनों का अध्ययन किया है, जो राज्य, युद्ध, संपत्ति, शिक्षा, विवाह तथा धर्म के प्रभाव से मानव - प्रकृति में हुए हैं। इनमें से प्रत्येक अध्याय का सारांश प्रस्तुत करके श्री रसल के सामाजिक दर्शन का समुचित दिग्दर्शन नहीं कराया जा सकता। अनेक संबद्ध विषयों के साहित्य में उनका सजीव योगदान है। वे सुझावों से संपन्न हैं। वे विचारोत्तेजक हैं। अतः मूल पाठ से ही पढ़ा जाना चाहिए। जहां तक समीक्षा का संबंध है, हो सकता है कि यह परंपरा के विरुद्ध हो, लेकिन इस दृष्टि से यह उचित है कि यह समीक्षा एक आर्थिक पत्रिका के लिए है। उसके लिए केवल इतना आवश्यक है कि हम संपत्ति की संस्था तथा श्री रसल द्वारा बताए गए मानव - प्रकृति के परिवर्तनों का विश्लेषण करें।

लेकिन इससे पूर्व कि हम यह विश्लेषण करें, यह उचित होगा कि हम इस बारे में विचार कर लें कि श्री रसल के अनुसार किस प्रकार युद्ध का दर्शन प्रगति के सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है।

  1. प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 19