274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
समूचे घर की होती हैं। लेकिन जहां तक किसी परिवार के सदस्य के कपड़ों का संबंध है हर सदस्य निश्चय ही उन पर अपने उपभोग का एकाधिकार जता सकता है। वे ‘व्यक्ति’ के होते हैं। अतः जब किसी वस्तु का उपभोग किया जाता है तो सवाल केवल उत्पादन और उपभोग का होता है, आवेग का नहीं। अतः सृजनात्मक वृत्ति तथा परिग्रह वृत्ति का स्तर अलग - अलग होता है। निश्चय ही सृजनात्मक वृत्ति के संवर्धन और परिग्रह वृत्ति के अल्पीकरण के तरीके भी अलग - अलग होंगे। एक का संवर्धन दूसरे का न्यूनीकरण करेगा ही, ऐसी कोई बात नहीं है।
इसके साथ ही हम श्री रसल की पुस्तक की समीक्षा को यहीं समाप्त करते हैं। इसमें ऐसी प्रचुर समाग्री है, जिसके आधार पर समाज के भावी पुनर्निर्माण की नींव रखी जा सकती है। श्री रसल ने सामाजिक जीवन के मनोवौज्ञानिक आधार पर विशेष बल दिया है। उसके लिए मेरी ओर से उन्हें शत - शत बधाइयां। सामाजिक पुनर्निर्माण तभी होगा, जब व्यक्ति और समाज के आपसी संबंध की सही जानकारी होगी। यह एक ऐसी समस्या है, जो अनेक समाजशास्त्रियों की पकड़ में नहीं आ सकती है। इस संबंध में श्री रसल की संकल्पना है कि जैसे व्यक्ति समाज से जुड़ा है, वैसे ही आवेग संस्था से जुड़ा है। इसमें संदेह नहीं कि इससे सच्ची संकल्पना और कोई हो नहीं सकती। फिर भी, पुस्तक में जिन अन्य समस्याओं का विवेचन किया गया है, उन्हें समझने के लिए मैं साग्रह सिफारिश करूंगा कि पाठक मूल को अवश्य पढ़ें। मैंने तो केवल श्री रसल की सही स्थिति पर वहां प्रकाश डालने का प्रयास किया है, जहां मेरा विचार है कि उन्हें गलत समझा जा सकता है। मैंने तो केवल उन पाठकों को सचेत किया है, जो आलोचक नहीं हैं और ध्यान न देने के कारण वे कतिपय मिथ्या धारणाओं के शिकार हो सकते हैं। दोनों ही दशाओं में मैंने श्री रसल तथा उनके पाठकों के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह किया है।