6. श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण - Page 290

श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण 273

हो। उन्हें आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि सौदेबाजी में अपने लाभार्जन को गंवाने के डर से हव (प्रतिमानव) उस विध्वंस का तांडव न करे, जो नीत्शे उससे कराना चाहते थे। अतः हम कह सकते हैं कि दोष संपत्ति का नहीं है, बल्कि विषय - वितरण का है। यथा, जिनके पास संपत्ति है ही नहीं, वे उसे पाने के लिए उन लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक विध्वंश करने के लिए तत्पर रहेंगे, जिनके पास संपत्ति है। आधुनिक युग का औद्योगिक विवाद इसका एक और उदाहरण है। उक्त टिप्पणियों को ध्यान में रखकर ही यह समझा जा सकता है कि हड़ताल के दौरान मालिकों की अपेक्षा मजदूर कहीं अधिक हिंसक हो जाते हैं। जहां जोखिम होगी, वहां ध्येय की धार कुंठित हो जाएगी और जहां जोखिम नहीं होगी, वहां उसकी धार पैनी हो जाएगी। अतः हो सकता है कि संपत्ति अनर्थकारी हो। फिर भी, ऐसा नहीं है कि उसमें भरपाई के गुण न हों।

यह उचित नहीं होगा कि हम चुपचाप एक सर्वाधिक बुनियादी धारणा की अनदेखी कर दें। यह धारणा श्री रसल के समूचे दृष्टिकोण में व्याप्त है। वह कहते हैं कि मानव के आवेगों तथा इच्छाओं को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, यथा सृजनात्मक वृत्ति वाली तथा परिग्रह वृत्ति वाली। हमारी कतिपय गतिविधियों का उद्देश्य होता है कि वे उस वस्तु का सृजन करें, जो अन्यथा विद्यमान नहीं है। अन्य का उद्देश्य होता है कि उस वस्तु का अर्जन करें या उसे बटोरें, जो पहले से विद्यमान है। सर्वोत्तम जीवन वह होता है, जिसमें सृजनात्मक आवेग अधिकतम तथा परिग्रही आवेग न्यूनतम भूमिका अदा करते हैं। ख्14, क्या आवेगों का विभाजन संभव है? क्या आवेग के उपयोग जैसी कोई बात होती है? इस चर्चा के दायरे में इस बड़े सवाल पर विचार नहीं किया जा सकता। मैं तो केवल एक प्रश्न करना चाहता हूं, क्योंकि मेरा विचार है कि किसी आवेग पर विशिष्टता का ठप्पा लगाकर श्री रसल अपनी स्थिति को निरापद नहीं बनाते। यदि कोई रोक न लगाई जाए तो हर आवेग कोई न कोई सृजनात्मक कार्य करेगा। सृजित वस्तु का कोई उपयोग होगा या नहीं, यह एक नितांत भिन्न बात है। आवेग या संवेग के कर्म से उसका क्या वास्ता! मेरा निवेदन है कि वह तो उत्पादन अथवा सृजन के तरीके पर निर्भर करेगा, उत्पादन चाहे व्यक्ति करे या समुदाय। वह तो उसके उपयोग के तरीके पर निर्भर करेगा, उपयोग चाहे व्यक्ति करे या समुदाय। जिस वस्तु को सामूहिक प्रयासों से तैयार किया जाता है, उसके उपयोग पर कोई भी व्यक्ति अधिकार नहीं बना सकता। पहली स्थिति के पक्ष में हम आदिवासियों के सामुदायिक या सामूहिक शिकार का उदाहरण दे सकते हैं। दूसरी स्थिति के पक्ष में पारविरिक स्थिति का उदाहरण संगत तथा सुखद होगा। बिना किसी भय अथवा चुनौती के कहा जा सकता है कि मेज पर परोसी गई चीजों अथवा घर की सजावट की चीजों पर निजी उपभोग का दावा कोई भी सदस्य कदापि नहीं करेगा। क्या सार्वजनिक स्मारकों पर एकाधिकार का दावा कोई भी व्यक्ति कभी करर सकेगा? वे चीजें

  1. प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 234