साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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(1) यदि सभी को समान मताधिकार दिया जाए तो ब्राह्मण, जहां तक उनकी
संख्या का संबंध है, भले ही उनकी संख्या थोड़ी - सी हो, पर जहां तक
मतदाताओं की कुल संख्या का संबंध है, वे बहुसंख्यक हो जाते हैं, जैसी
कि वर्ग II में स्थिति दी गई है।
(2) यद्यपि लिंगायत तथा मराठी जैसे ब्राह्मणेत्तर समुदाय समान मताधिकार के
आधार पर मतदाता सूची में स्थान पाते हैं, फिर भी उनकी जनसंख्या की
तुलना में उनके मतदाताओं का अनुपात उस अनुपात के मुकाबले नगण्य
है, जो ब्राह्मण मतदाताओं का ब्राह्मण जनसंख्या की तुलना में है।
- अपने मतदाताओं की तुलना में ब्राह्मणों का अनुपात वास्तव में अत्यधिक है। यह न तो उनके प्रति विश्वास और न ही उनकी अपनी संख्या के आधार पर उचित है। भले ही लिंगायतों की यह शिकायत उचित हो सकती है कि उनके मतदाताओं का अनुपात कम है, लेकिन वे व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व प्राप्त करने में सफल होंगे। भले ही मराठों की संख्या ब्राह्मणों से अधिक हो, पर इसके बावजूद उनके मतदाताओं का अति अल्प अनुपात मतदाता सूची से वंचित रहता है और इस बात की पूरी संभावना है कि वे अपने लिए व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व प्राप्त करने में असमर्थ रहेंगे।
इस तर्क के आधार पर मराठों के लिए विशेष व्यवस्था को उचित ठहराया जा सकता है और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
प्रश्न यह है कि व्यवस्था का रूप क्या हो। मेरे विचार में वह आरक्षित सीटों या पृथक निर्वाचक - मंडलों का रूप न ले, बल्कि कम योग्यता वाले मताधिकार का रूप ले। मताधिकार ब्राह्मण की अपेक्षा ब्राह्मणेत्तर को सहज सुलभ होना चाहिए। इस व्यवस्था से मतदाता सूची में मराठों की स्थिति सुधर जाएगी और ब्राह्मण की नितांत अनुकूल स्थिति के बराबर हो जाएगी। इसमें सभी का हित है कि ब्राह्मण इस समय राजनीति में जैसी प्रभुत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है, वैसी वह न करे। उसने देश के सामाजिक जीवन पर घातक प्रभाव प्रभाव डाला है और यह सभी के लिए हितकर होगा कि राजनीतिक पर उसके घातक प्रभाव को कम से कम रखा जाए। वह निहायत गैर - मिलनसार है और अत्यंत समाज - विरोधी है।
संविधान - सुधार संबंधी रिपोर्ट को तैयार करने वाले भी सीमित तथा एकरूप मताधिकार के पक्ष में नहीं है। उनका कहना है, ‘हमारा विचार है कि मताधिकार को यथासंभव व्यापक बनाया जाना वांछनीय है। उसकी सीमाओं का निर्धारण व्यावहारिक कठिनाइयों के आधार पर किया जना चाहिए, न कि किन्हीं पूर्व निश्चित कसौटियों के आधार पर; कि योग्यता निश्चित करने के लिए कितनी शिखा अथवा कितनी आमदनी हो। यह संभव है कि जनसंख्या तथा धन के असमान वितरण के कारण न केवल प्रांतों के बीच, बल्कि एक ही प्रांत के अलग - अलग हिस्सों के बीच भी वोट संबंधी योग्यताओं में अंतर करना जरूरी हो सकता है’ (पृ. 147)। इसमें मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि हमें न केवल प्रांतों अथवा उन हिस्सों के बीच वोट संबंधी योग्यताओं में अंतर करना चाहिए,