14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बल्कि एक ही प्रांत के समुदायों के बीच भी करना चाहिए। यदि यह अंतर नहीं होगा तो अल्प संख्या में धनवान और पढ़े - लिखे लोगों वाले चंद समुदाय अधिक वोट प्राप्त कर लेंगे और गरीब तथा अनपढ़ लोगों वाला बहुसंख्य समुदाय कम वोट प्राप्त करेगा। मताधिकार संबंधी एकरूपता समाप्त कर दी जानी चाहिए। इसका महत्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि कुछ ब्रह्मणेत्तर समुदाय आजकल सीटों के लिए जिस सांप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व अथवा आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वह समाप्त हो जाएगी।
आमतौर पर अस्पृश्य लोग दया के पात्र समझे जाते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक योजना में उनकी इस आधार पर उपेक्षा कर दी जाती है कि उनका ऐसा कोई हित नहीं है, जिसकी रक्षा की जाए। लेकिन फिर भी उनके हित सबसे महान हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी कोई बहुत बड़ी संपत्ति है, जिसे जब्त होने से बचाया जाए। उनका तो व्यक्तित्व ही जब्त कर लिया गया है। सामाजिक - धार्मिक अशक्ताओं ने अस्पृश्यों को मानव के स्तर से गिरा दिया है। अतः दांव पर लगे उनके हित मानव मात्र के हित हैं। ऐसे महत्वपूर्ण हितों की तुलना में संपत्ति संबंधी हित तो तुच्छ हैं।
दास को परिभाषित करते हुए प्लेटो ने कहा कि दास वह है, जो दूसरों के कार्य करता है, जो उसके आचरण को नियंत्रित करते हैं। यदि हम इस परिभाषा को मान लें तो अस्पृश्य सचमुच ही दास हैं। अस्पृश्यों को ऐसे सामाजिक ढांचे में ढाला गया है कि वे अपनी दयनीय दशा पर उफ! तक न करें। इससे भी घटिया बात यह है कि वे सपने में भी कभी नहीं सोचते कि वे अपनी दशा सुधारें और अन्य वर्गों को उस सामान्य सम्मानजनक व्यवहार के लिए विवश करें, जिसकी एक व्यक्ति दूसरे से अपेक्षा करता है। उनका जन्म तो उनके भाग्य के अनुसार हुआ है, यह धारणा उनके मन में इतना घर कर गई है कि वे कभी यह विचार करते ही नहीं हैं कि भाग्य ही सब कुछ नहीं है। कोई भी कभी भी उन्हें यह बात नहीं समझा सकेगा कि सभी मानव एक ही मिट्टी के बने हुए हैं, अथवा उनके साथ जो बर्ताव किया जा रहा है वे उससे बढि़या बर्ताव के हकदार हैं।
बर्ताव का वास्तविक वर्णन नहीं किया जा सकता। अस्पृश्य शब्द में उनकी विपत्तियों और कष्टों का निचोड़ आ जाता है। अस्पृश्यता ने न केवल उनके व्यक्तित्व के विकास को अवरुद्ध कर दिया है, बल्कि उनकी आर्थिक उन्नति के रास्ते में भी कांटे बोए हैं। उसने उनके कतिपय नागरिक अधिकारों को भी हड़प लिया है। यथा, कोंकण में अस्पृश्य आम रास्ते पर नहीं चल सकते। यदि कोई सवर्ण जाति का व्यक्ति उसके सामने आ जाता है तो उसे मार्ग से हटना पड़ता है और इतनी दूरी पर खड़ा होना पड़ता है कि उनकी परछाई सवर्ण व्यक्ति पर पड़े। अस्पृश्य नागरिक भी नहीं है। नागरिकता तो अधिकारों का पुंज है, यथा (1) व्यक्तिगत स्वतंत्रता, (2) व्यक्तिगत सुरक्षा, (3) निजी संपत्ति रखने के अधिकार, (4) विधि के समक्ष समता, (5) अंतःकरण की स्वतंत्रता, (6) वाक् - स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति - स्वातंत्र्य, (7) सम्मेलन का अधिकार, (8) देश की सरकार में प्रतिनिधित्व का अधिकार, और (9) राज्य के अधीन पद धारण