साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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करने का अधिकार। कहा जा सकता है कि ब्रिटिश सरकार ने धीरे - धीरे ये अधिकार सिद्धांत रूप में अपने भारतीय प्रजाजनों को दे दिए हैं। नागरिकता की सार्थकता के लिए दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार हैं - पहला, प्रतिनिधित्व का अधिकार और दूसरा राज्य के अधीन पद धारण करने का अधिकार। लेकिन अस्पृश्यों की अस्पृश्यता उन्हें इन अधिकारों की पहुंच से कोसों दूर रखती है। कुछ स्थानों पर तो उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत सुरक्षा जैसे मामूली अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। विधि के समक्ष समता का भी उन्हें सदा आश्वासन नहीं मिलता। ये सब अस्पृश्यों के हित हैं। जैसा कि स्वतः स्पष्ट है, उनका प्रतिनिधित्व केवल अस्पृश्य ही कर सकते हैं। वे उनके वास्तविक हित हैं और वास्तव में कोई अन्य उनके लिए आवाज नहीं उठा सकता। मुक्त व्यापार हित की आवाज एक ब्राह्मण, एक मुसलमान अथवा मराठा समान रूप से उठा सकता है। लेकिन उनमें से कोई भी अस्पृश्यों के हितों की आवाज नहीं उठा सकता, क्योंकि वे अस्पृश्य नहीं हैं। अस्पृश्यता के अधीन एक निश्चित हित समूह आता है और उसके लिए केवल अस्पृश्य ही आवाज उठा सकते हैं। अतः यह स्पष्ट है कि हमें ऐसे अस्पृश्यों को खोजना ही होगा, जो अपनी शिकायतों और हितों को प्रस्तुत कर सकें। दूसरे, हमें उन्हें इतनी संख्या में खोजना होगा कि वे ऐसी शक्ति बन सकें कि अपने दुख - दर्द के बारे में मांग प्रस्तुत कर सकें।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सामान्य प्रादेशिक निर्वाचक - मंडल कानून बनाने वाले निकाय में पर्याप्त संख्या में अस्पृश्यों को चुनकर भेज सकेंगे? पिछले आंकड़ों से हमें पता चलता है कि (सारणी में महार के प्रतिनिधित्व वाले) अस्पृश्य हालांकि जनसंख्या के प्रति हजार संख्या की दृष्टि से 69.5 प्रतिशत थे, पर उन्हें अपने वर्ग से एक भी मत नहीं मिला। ऐसी परिस्थितियों में सामान्य निर्वाचक - मंडल में उनके लिए अपने उम्मीदवार को चुनना असंभव है। दूसरी ओर उन्हें अस्पृश्य उम्मीदवार के लिए स्पृश्य हिन्दुओं के वोटों से भी हाथ धोना पड़ेगा। जातियों का वर्गीकरण एक ऐसा निश्चित धर्मसम्मत आधार प्रस्तुत करता है, जो अस्पृश्यों पर दुहरी मार करता है। यह निम्न वर्ग के मन में उच्च वर्ग के प्रति सम्मान पैदा करता है, जब कि उच्च वर्ग के मन में निम्न वर्ग के प्रति अपमान। इस प्रकार सम्मान का पलड़ा भारी और घृणा एवं अपमान का पलड़ा हल्का हो जाता है और अस्पृश्यों का दोनों तरफ से तिरस्कार किया जाता है। स्पृश्य अस्पृश्यों को एक भी वोट दिए बगैर उनके मतों की पहले से ही अत्यल्प संख्या के आधार पर निश्चित रूप से काफी संख्या में चुने जाएंगे।
ऐसी स्थिति में सामान्य प्रादेशिक निर्वाचक - मंडल में अस्पृश्यों को अपने सबसे प्रमुख हितों को दांव पर लगाना पड़ेगा और उन्हें सबसे अधिक घाटा उठाना पड़ेगा। शुरू में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने की विशेष व्यवस्था करनी होगी। लेकिन इससे पहले कि कोई योजना तैयार की जा सके, यह देखना जरूरी है कि बंबई प्रेसिडेंसी में कितने लोग अस्पृश्य हैं। वर्ष 1911 के लिए बंबई प्रेसिडेंसी की जनगणना रिपोर्ट में उन जातियों के अगले पृष्ठ पर आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं, जो अपवित्रता पैदा करती है :