1. मताधिकार के बारे में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य - Page 37

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों द्वारा चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की कुल संख्या।

इन नौ निर्वाचित सदस्यों को एक निर्वाचक - मंडल बनाना चाहिए, ताकि वे अपने बीच से एक सदस्य चुन सकें जो इंपीरियल विधान परिषद में इस प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों का प्रतिनधित्व कर सके।

  1. यह आपत्ति की जा सकती है कि भले ही आठ प्रतिनिधियों की संख्या अस्पृश्यों की जनसंख्या की तुलना में अधिक नहीं है, लेकिन वह अस्पृश्यों की मतदाता संख्या की तुलना में अधिक हो सकती है। यह सही है कि अस्पृश्य एक गरीब समुदाय है और उसी मताधिकार के अधीन वह प्रति हजार पर अन्य समुदायों की तुलना में मतदाताओं का कम अनुपात प्राप्त करते हैं। लेकिन यदि अस्पृश्यों की इस गंभीर स्थिति को स्वीकार किया जाए तो हमें उनके प्रतिनिधियों की संख्या को घटाना नहीं चाहिए, बल्कि उनके मतदाताओं की संख्या में वृद्धि करने का लक्ष्य बनाना चाहिए, अर्थात् हमारा यह लक्ष्य होना चाहिए कि जहां तक अस्पृश्यों का संबंध है, मताधिकार संबंधी उनकी योग्यता को कम कर दिया जाना चाहिए।

  2. मताधिकार क्या है, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। एक तर्क के अनुसार यह आग्रह किया जाता है कि मताधिकार केवल उन्हीं लोगों को दिया जाना चाहिए, जिनसे आशा की जा सके कि वे उसका विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे। इसके विपरीत प्रो. एल.टी. हाबहाउस ने कहा है, ‘यह सच है कि लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मतदाताओं को दिए गए अवसर पर उनकी प्रतिक्रिया क्या है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि वोटरों की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनको अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। लोकप्रिय सरकार का प्रयोग स्वयं में एक संपूर्ण शिक्षा है। ...मताधिकार को अपने आपमें स्पष्टतः एक ऐसी प्रेरणा कहा जा सकता हैं जो रुचि पैदा करने के लिए आवश्यक होती है। मात्र मतदान का अधिकार एक शांतिप्रिय नागरिक को नारेबाजों तथा कुचक्रियों के अत्याचारों से मुक्त करता है। वर्तमान निष्क्रियता की धारणा इस बात का पर्याप्त कारण नहीं है कि उसे उत्तरदायी सरकार से वंचित किया जाए अथवा मतदान के क्षेत्र को सीमित किया जाए।’ इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मताधिकार एक प्रकार की शिक्षा है और ऐसे समूह हैं जिनके बीच धन अैर शिक्षा का समान वितरण नहीं है तथा इन समूहों के विचार भी एक जैसे नहीं हैं, रिपोर्ट तैयार करने वालों ने ठीक ही कहा है कि मताधिकार की एकरूपता को कायम नहीं रखा जा सकता।

  3. लेकिन अस्पृश्यों के मामले में जहां उनके प्रतिनिधियों की संख्या कम करने के संबंध में कुछ कारण हैं, वहीं उनके निर्वाचक - मंडलों का विस्तार करने के लिए भी अनेक कारण हैं। यदि वर्तमान मताधिकार की छाया में अस्पृश्य बड़ी संख्या में निर्वाचक नहीं बन सकते, तो यह उनका दोष नहीं है। अस्पृश्यता ही उनकी नैतिक तथा भौतिक प्रगति में बाधक है। धन प्राप्ति के तीन स्रोत हैं - व्यापार, उद्योग और नौकरी। अस्पृश्यता के कारण इन तीनों में वे प्रवेश नहीं कर सकते हैं। अस्पृश्य व्यापारी से कोई भी हिन्दू समान नहीं

खरीदेगा। अस्पृश्य लाभप्रद नौकरी नहीं पा सकता। लेकिन सेना - सेवा पर अस्पृश्यों का