साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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एकाधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने से रहा है। वे सेना में इतनी विशाल संख्या में भर्ती हो गए थे कि भारतीय सेना आयोग, 1859 को प्रस्तुत की गई अपनी टिप्पणी में मारकस ट्वीडलडेल ने लिखा थाः ‘इस बात को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि निम्न जाति के लोगों की मदद से ही भारत पर विजय प्राप्त की गई।’ लेकिन गदर के बाद जब अंग्रेजों को मराठे सैनिक मिलने लगे तो निम्न जाति के जो सैनिक बंबई सेना के आधार थे, उनकी स्थिति डांवाडोल हो गई। इसका कारण यह नहीं था कि मराठे बेहतर सैनिक थे, बल्कि यह था कि उनके धार्मिक पूर्वग्रह ने उन्हें निम्न जाति के अफसरों के अधीन सेवा करने से रोका। पूर्वग्रह इतना प्रबल था कि जाति - भेद से परे अंग्रेजों को भी अस्पृश्य वर्गों से भर्ती रोकनी पड़ी। इसी प्रकार अस्पृश्यों को पुलिस बल में नौकरी नहीं दी जाती। अनेकानेक सरकारी कार्यालयों में अस्पृश्यों के लिए नौकरी पाना संभव नहीं है। मिलों में भी भेदभाव बरता जाता है। सूती कपड़ा मिलों के बुनकर विभागों में अस्पृश्यों को भर्ती नहीं किया जाता, जबकि उमनें से अनेक पेशेवर बुनकर हैं। प्रस्तुत है, बंबई नगरपालिका की स्कूल - प्रणाली का एक उदाहरण। बंबई, निगम द्वारा शासित सर्वप्रदेशीय महानगर है। भारत के किसी भी निगम की तुलना में वहां अधिक आजादी है, पर वहां दो तरह के स्कूल हैं - एक स्पृश्यों के बच्चों के लिए और दूसरा अस्पृश्यों के बच्चों के लिए। यह स्वयं में एक नोट करने योग्य बात है। इससे भी अधिक ध्यान देने योग्य कुछ और बातें भी हैं। निगम ने स्कूलों के अनुसार उनके अध्यापकों को भी स्पृश्यों और अस्पृश्यों में विभाजित कर दिया है। चूंकि अस्पृश्य अध्यापकों की कमी है, अतः अस्पृश्यों के कुछ स्कूलों में स्पृश्य अध्यापक काम कर रहे हैं। एक अत्यंत कटु मजाक यह है कि यदि अस्पृश्य स्कूल सेवा में कोई उच्च वेतनमान है वहां होगा भी, क्योंकि वहां प्रशिक्षण प्राप्त चंद अस्पृश्य अध्यापक होते हैं, तो स्पृश्य अध्यापक को उस वेतनमान में नियुक्त किया जा सकता है। लेकिन किसी स्पृश्य स्कूल में यदि कोई उच्च वेतनमान उपलब्ध होगा तो उस वेतनमान में अस्पृश्य अध्यापक को नियुक्त नहीं किया जा सकता। उसे तब तक इंतजार की घडि़यां गिननी होंगी, जब तक कि अस्पृश्यों के लिए सेवा में स्थान खाली नहीं हो जाता। यह है हिन्दू समाज के जीवन का आचार - शास्त्र। इसके साए में यदि अस्पृश्य गरीब हैं, तो आशा की जाती है कि समिति उन्हें प्रतिनिधित्व से इस आधार पर वंचित नहीं करेगी कि उनका निर्वाचन - क्षेत्र छोटा है, बल्कि यह देखेगी और उपाय करेगी कि उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त हो, ताकि वे (अस्पृश्य) उन प्रतिकूल परिस्थितियों को दूर कर सकें जो उनकी गरीबी को जन्म देती है। इस समय जब उनके लिए धन प्राप्ति के सभी रास्ते बंद हैं तो यह ठीक नहीं होगा कि अस्पृश्यों से संपत्ति संबंधी उच्च योग्यता की अपेक्षा की जाए। पहले उन्हें धन प्राप्ति के अवसरों से वंचित करना और फिर उनसे संपत्ति संबंधी उच्च योग्यता की अपेक्षा करना तो ‘जले पर नमक छिड़कने’ जैसा ही है। अस्पृश्यों में पर्याप्त मतदान शक्ति पैदा करने के लिए कैसा मताधिकार और क्या योग्यता - स्तर अपेक्षित है? आंकड़ों के अभाव में इसका निर्णय मैं समिति पर छोड़ता हूं। बेहतर होगा कि मताधिकार के योग्यता - स्तर को कम किया जाए, ताकि राजनीतिक जीवन में