प्रस्तावना
मैं समझता हूं कि इस पत्रक * के स्रोत तथा इसके प्रयोजन के संबंध में कुछ कहना असंगत नहीं होगा जिसकी वजह से मुझे यह पत्रक इस समय प्रकाशित करना पड़ा है।
इस देश में अनेक लोगों को यह मालूम होगा कि पूना में द गोखले इंस्टीट्यूट आफ पॉलिटिक्स एंड इकोनोमिक्स नामक संस्थान है, जो डॉ. डी.आर. गाडगिल के निर्देशन में कार्य कर रहा है। यह संस्िान अपना स्थापना दिवस मनाने के लिए प्रतिवर्ष एक समारोह आयोजित करता है और इस अवसर पर राजनीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र से संबंधित किसी विषय पर व्याख्यान देने के लिए किसी को आमंत्रित करता है। इस वर्ष डॉ. गाडगिल ने मुझसे व्याख्यान देने के लिए कहा। मैंने यह आमंत्रण स्वीकार किया और अपने व्याख्यान के विषय के रूप में संघीय योजना को चुना। इस व्याख्यान में संघ की संरचना तथा उसकी मीमांसा, दोनों ही शामिल थे। यह व्याख्यान 29 जनवरी, 1939 को पूना के गोखले हॉल में दिया गया था। तैयार किया गया यह व्याख्यान मुझे दिए गए समय के हिसाब से बहुत अधिक लंबा हो गया था, फिर भी मैंने श्रोताओं को दो घंटे तक टिकाए रखा, जबकि सामान्यतः ऐसे व्याख्यान के लिए निर्धारित समय एक घंटा होता है, मुझे इस व्याख्यान के संघीय स्वरूप से संबंधित पूरे भाग को तथा इसकी संरचना से संबंधित कुछ भाग को छोड़ना पड़ा। लेकिन इस पत्रक में इस अवसर पर मेरा स्वतंत्र रूप से तैयार किया गया संपूर्ण व्याख्यान दिया गया है।
इस पत्रक के स्रोत के बारे में इतना कहना ही काफी है। अब, जहां तक इसके प्रकाशन के कारणों का संबंध है, गोखले संस्थान में दिए गए सभी व्याख्यान प्रकाशित किए जाते हैं, अतः इस प्रक्रिया के अनुसार इसे भी प्रकाशित होना चाहिए था। लेकिन कुछ अन्य कारणों से भी मैं इसे प्रकाशित नहीं करवा सका। जहां तक संघ का संबंध है, ज्यादातर भारतीय आम जनता इससे अनभिज्ञ प्रतीत होती है। इस तथ्य के बावजूद कि संघ होना चाहिए और यह भी कि संघ बुरी चीज है, आम जनता यह स्पष्ट रूप से नहीं जानती कि इस संघ की प्रकृति तथा संकल्पना क्या है, और इसलिए वह इसके बारे में कोई बौद्धिक राय बनाने में असमर्थ है। यह आवश्यक है कि आम जनता के हाथ में एक ऐसा पत्रक हो, जिसमें संघ की रूपरेखा तथा उसकी मीमांसा संक्षिप्त रूप में उपलब्ध हो, जो उस योजना की कामचलाऊ समझ प्रदान करने में पर्याप्त हो। मुझे आशा है कि यह पत्रक इस आवश्यकता को पूरा करेगा।
* युग पत्रक : संख्या 3