4. बोधिसत्व गौतम सम्बोधि के पश्चात् बुद्ध हो गए - Page 104

75

  1. अपने आठवें जीवन में वह ‘अचल-भूमि’ प्राप्त हो जाता है। अचल अवस्था में

बोधिसत्व को कुछ भी प्रयत्न नहीं करना पड़ता। कृत-कृत्य होने से अनायास

ही उसके द्वारा कुशल कर्म होते हैं। जो कुछ भी वह करेगा उसमें वह सफल

होगा।

  1. अपने नौवें स्तर पर जीवन में वह ‘साधुमती-भूमि’ प्राप्त हो जाता है। वह वैसी

अवस्था है, जिसमें व्यक्ति सभी धर्मों या पद्धतियों पर विजय पाकर, उनमें प्रवेश

कर जाता है, सभी दिशाओं को जीत लेता है और समय की सीमाओं से परे

हो जाता है।

  1. अपने दसवीं अवस्था में वह ‘धर्ममेघा-मेघा’ बन जाता है। बोधिसत्व को बुद्ध

की दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो जाती है।

  1. बुद्ध होने के लिए बोधिसत्व को इन दस बलों को प्राप्त करना आवश्यक होता

है।

  1. एक के बाद दूसरी अवस्था में पहुँचने के लिए बोधिसत्व को न केवल इन

दस बलों को प्राप्त करना पड़ता है बल्कि उसे दस पारमिताओं की पूर्णता का

अभ्यास करना पड़ता है।

  1. एक जीवन में एक पारमिता की पूर्ति करनी होती है। पारमिताओं को क्रमशः

करना पड़ता है। एक पारमिता की पूर्ति एक जीवन में करनी पड़ती है, ऐसा

नहीं कि एक पारमिता का कुछ भाग और कुछ दूसरी का।

  1. जब दोनों तरह से कोई बोधिसत्व निपुण हो जाता है, तब वह बुद्ध बनने के

योग्य बन जाता है। बुद्ध बनना बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है।

  1. जातकों अथवा बोधिसत्व की जन्म-अवस्थाओं का सिद्धांत ब्राह्मणों के अवतारवाद

के सिद्धान्त सर्वदा प्रतिकूल हैं। अवतारवाद का अर्थ ईश्वर के अवतार से है।

  1. बुद्ध के व्यक्तित्व में पवित्रता की पराकाष्ठा ही जातकों के सिद्धांत का आधार

है।

  1. अवतारवाद के सिद्धांत के अनुसार भगवान को अपने अस्तित्व में निर्मल (पवित्र)

होने की आवश्यकता नहीं। ब्राह्मणवादी अवतारवाद का सिद्धांत केवल इतना

कहता है कि चाहे ईश्वरावतार अपने आचरण में अपवित्र और अनैतिक ही क्यों

न हो, वे अपने अनुयायियों या भक्तों की रक्षा के लिए विभिन्न रूप धारण

करते हैं।