4. बोधिसत्व गौतम सम्बोधि के पश्चात् बुद्ध हो गए - Page 103

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. तीसरे जन्म में प्रभावारी-भूमि में वह (दीप्ति) प्रादीप्ति करता है। बोधिसत्व

की प्रज्ञा इस समय तक दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाती है। वह अनात्म और

अनित्यता की सत्यता को अच्छी प्रकार जानता है और उसे हृदयंगम कर लेता

है। उसकी एक मात्र आकांक्षा ऊँची से ऊँची प्रज्ञा प्राप्त करने की होती है।

इसके लिए वह कुछ भी त्याग करने को तैयार रहता है।

  1. अपने चौथे जन्म में वह अर्चिष्मती-भूमि (प्रभा की बुद्धिमत्ता) प्राप्त करता है।

इस जन्म में बोधिसत्व अपना सम्पूर्ण ध्यान आष्टांगिक मार्ग पर केन्द्रित करता,

और सम्भव व्यायामों पर केन्द्रित करता, चार प्रयत्नों पर केन्द्रित करता, चार

ऋद्धि-बल पर केन्द्रित करता है और पांच प्रकार के शील पर केन्द्रित करता

है।

  1. पाँचवें जन्म में वह सुदुर्ज्या-भूमि (जीतने में दृढ़वतता) को प्राप्त करता है। वह

सापेक्ष और निरपेक्ष के बीच सम्बंध को अच्छी प्रकार हृदयंगम कर लेता है।

  1. अपने छठे जन्म में वह अभिमुखी-मुखी भूमि पाता है। बोधिसत्व इस अवस्था

में अपने को वस्तुओं के विकास, उनके कारण, बारह निदान को अच्छी तरह

ग्रहण करने के लिए तैयार होता है। अभिमुखी-ज्ञान उसके हृदय में अविद्या से

ग्रसित समस्त मानवों के लिए महाकरुणा का संचार कर देता है।

  1. अपने सातवें जन्म में बोधिसत्व दूरगमा-भूमि (एकाकारता) को प्राप्त करता

है। अब बोधिसत्व देश और काल के संबंध से परे हो जाता है। वह अनंत के

साथ एक हो जाता है, लेकिन सभी प्राणियों के लिए महाकरुणा के कारण

वह नाम-रूप से युक्त है। वह दूसरों से इसी बात से अलग है, क्योंकि संसार

की भव-तृष्णा उसे उसी प्रकार स्पर्श नहीं करती, जिस प्रकार पानी कमल की

पत्तियों को। वह अपने व्यक्तियों की इच्छाओं को पूरा करता है, वह दान, क्षमा,

कुशलता, वीर्य, शांति, बुद्धिमत्ता और सवोत्तम प्रज्ञा का अभ्यास करता है।

  1. यद्यपि इस जीवन में वह धर्म को जानता है, फिर भी धर्म को लोगों की समझ

के अनुकूल प्रस्तुत करता है। वह जानता है कि उसे कुशल और क्षमाशील

होना चाहिए। दूसरे लोग उसके साथ कैसा भी व्यवहार करें, वह उद्विग्नता-रहित

होकर धैर्य से सह लेता है, क्योंकि वह जानता है कि अविद्या के कारण लोग

उसकी मंशा को ठीक से नहीं समझ रहे हैं। इसके साथ ही वह दूसरों की

भलाई करने और अपने प्रयास में थोड़ी-सी भी शिथिलता नहीं आने देता है,

और न वह अपने चित्त को प्रज्ञा से इधर-उधर भटकने देता है। इसलिए उस

पर कितनी भी विपत्तियाँ आएँ, वे उसे सुपथ से कभी नहीं हटा सकतीं।