78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. बुद्ध और वैदिक ऋषि
- मंत्रों अर्थात् ऋचाओं और स्तुतियों के संग्रह वेद हैं। ऋचाओं के उच्चारण करने
वालों को ‘ऋषि’ कहते हैं।
- इन्द्र, वरुण, अग्नि, सोम, ईशान, प्रजापति, ब्रह्म, महषि, यम इत्यादि देवताओं
के प्रति सम्बोधित करके की गई प्रार्थनाएँ मंत्र ही हैं।
- शत्रुओं से रक्षा के लिए, धन प्राप्ति के लिए, भोजन, मांस व सुरा जैसे उपहार
स्वीकार करने के लिए भक्तों की ओर से केवल प्रार्थनाएँ हैं।
- वेदों में दर्शन कुछ अधिक नहीं है। लेकिन कुछ वैदिक ऋषियों के दार्शनिक
स्वभाव के काल्पनिक चिन्तन मिलते हैं।
वे वैदिक ऋषि थे-1. अधमर्षण 2. प्रजापति परमेष्ठी 3. ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति
अनिल 5. दीर्घतमा 6. नारायण 7. हिरण्यगर्भ तथा 8. विश्वकर्मा।
इन वैदिक दार्शनिकों की मुख्य समस्याएँ थीं_ संसार की उत्पत्ति कैसे हुई?
अलग-अलग वस्तुओं की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? उनमें एकता एवं अस्तितव
क्यों है? किसने बनाया और किसने विहित किया? यह संसार कहाँ से उत्पन्न
हुआ और किसमें विलीन हो जाएगा?
- अर्धमर्षण का मत था कि संसार की उत्पत्ति तपस (ताप) से हुई है। तपस
रचनात्मक सिद्धांत था, जिससे शाश्वत नियम और सत्य की उत्पत्ति हुई। इनसे
तमस (रात) की उत्पत्ति हुई। तमस से जल और जल से काल (समय) की
उत्पत्ति हुई। काल से सूर्य, चन्द्रमा, स्वर्ग, पृथ्वी, आकाश और प्रकाश का जन्म
हुआ और काल ने ही दिन और रात को संचालित किया।
- ब्रह्मणस्पति की कल्पना थी कि सृष्टि असत् से सत् के रूप में हुई। असत् का
अर्थ उन्होंने अनंत से लिया था। सत् मूल रूप से असत् से ही उत्पन्न हुआ।
असत् ही सभी सत्, सभी संभव, और जो अभी असत् है का स्थायी आधार
है।
- प्रजापति परमेष्ठी ने इस समस्या से आरंभ किया-‘‘क्या सत का आविर्भाव
असत् से हुआ?’’ उनका मत था कि यह प्रश्न अप्रासंगिक है, उनके अनुसार
सभी चीजों की उत्पत्ति का मूल पदार्थ जल है। उनके अनुसार यह मूल पदार्थ
जल न तो सत् के अन्तर्गत आता है और न ही असत् के अन्तर्गत।
- परमेष्ठी ने जड़ और चेतन के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींची। उनके