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अनुसार किसी निहित तत्व के कारण जल भिन्न-भिन्न वस्तुओं का आकार
ग्रहण करता है, उन्होंने विश्वव्यापी इच्छा-शक्ति से काम नाम दिया।
- अनिल एक अन्य वैदिक दार्शनिक था। उनके अनुसार मुख्य तत्व वायु था।
गति के लिए इसमें निहित क्षमता थी। इसी में उत्पन्न करने का सिद्धांत निहित
था।
- दीर्धतमा ने कहा कि सभी सत्व अंतिम रूप से सूर्य पर निर्भर करते हैं। अपने
में निहित बल के कारण ही सूर्य आगे-पीछे होता है।
- सूर्य किसी भूरे रंग के पदार्थ से निर्मित है। इसी प्रकार विद्युत और आग भी
निर्मित है।
- सूर्य, विद्युत और अग्नि द्वारा ही जल के बीजांकुर पैदा होते हैं। जल के द्वारा
पौधे के बीजांकुर पैदा होते हैं। दीर्धतमा का ऐसा ही मत था।
- नारायण के अनुसार पुरुष ही जगत का आदि कारण है। पुरुष के द्वारा ही सूर्य,
चन्द्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, आकाश, क्षेत्र, ऋतु, वायु प्राणी, सभी
जीव, सभी वर्गों के मनुष्य तथा सभी माननीय संस्थाओं की उत्पत्ति हुई।
- हिरण्यगर्भ का सिद्धांत परमेष्ठी और नारायण के मध्य का था। हिरण्यगर्भ का
अर्थ है, स्वर्ग बीजांकुर। यही विश्व की वह महान शक्ति थी, जिससे सभी
प्रकार की दिव्य और पार्थिव शक्तियों और अस्तित्व के मूल स्रोत की उत्पत्ति
हुई।
- हिरण्यगर्भ का अर्थ अग्नि भी है। अग्नि से ही सौर-मण्डल की उत्पत्ति हुई,
जो विश्व उत्पत्ति का सिद्धांत है।
- विश्वकर्मा के मत के अनुसार जल को सभी वस्तुओं का मूल पदार्थ मानना अपूर्ण
और अनुचित है। साथ ही, इससे इस पूरे संसार की उत्पत्ति मानना और उसे गति
की निहित शक्ति देना ठीक नहीं है। यदि हम जल को ही मूल उपादान मानें,
जिसमें परिवर्तन का सिद्धांत निहित है, तो हमें पता लगाना पड़ेगा कि जल में
अपना अस्तित्व कहाँ से प्राप्त किया। साथ ही, उसके उत्पादक शक्ति, उत्पत्ति
सिद्धांत, तात्विक बल, नियम आदि कैसे अस्तित्व में आए?
- विश्वकर्मा ने ईश्वर को उपादान कारक माना है। ईश्वर ही आदि में है और ईश्वर
ही अंत में है। वह इस दृश्य विश्व से पहले से है, वह विश्वव्यापी शक्ति की
उत्पत्ति से भी पहले का है, वह केवल ईश्वर ही है, जिसने विश्व का निर्माण
किया और इसे संचालित किया। वह अजन्मा है, जिसमें अभी की सभी चीजें