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92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

1. उनके समकालीन

  1. गौतम की प्रव्रज्या के समय देश में अत्यधिक बौद्धिक उत्तेजना की उथल-पुथल

मची हुई थी। ब्राह्मणी दर्शन के अलावा अलग-अलग दर्शन की बासठ परम्पराएँ

थीं। ये सभी ब्राह्मणी दर्शन की विरोधी थीं। उनमें से कम से कम छह ध्यान

देने योग्य थीं।

  1. इन दार्शनिक परम्पराओं में से एक के प्रमुख थे पूर्ण, काश्यप। उनका विचार

‘अक्रियावाद’ कहलाता था। उनका कहना था कि आत्मा किसी भी तरह कर्म

द्वारा प्रभावित नहीं होती। चाहे कोई काम करे या कराए, चाहे कोई किसी को

चोट पहुँचाए या कोई किसी की हत्या कर दे, चाहे कोई चोरी करे या करवाए

या डकैती डाले या डलवाए, चाहे कोई व्यभिचार करे या करवाए, चाहे कोई

झूठ बोले या बुलवाए, आत्मा पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है। कोई गंदे से

गंदा कार्य भी आत्मा को पाप से लिप्त नहीं करता है। कोई कार्य कितना ही

अच्छा हो आत्मा को पुण्य से युक्त नहीं करता। आत्मा पर कोई प्रतिक्रिया

(फल) नहीं होती। जब कोई व्यक्ति मरता है तो उसके सारे तत्व उन मूल

तत्वों में मिल जाते हैं, जिनसे उसका शरीर बना है। मरने के बाद कुछ नहीं

बचता, न शरीर न आत्मा।

  1. दूसरी परम्परा (विचारधारा) नियतिवाद के नाम से जानी जाती थी। इसके मुख्य

प्रस्तुतकर्ता मक्खली गोसाल थे। उनका विचार एक प्रकार का भाग्यवादी या

निश्चयवादी था। उनका विचार था कि कोई कुछ नहीं कर सकता और न कोई

कुछ रोक सकता है। घटनाएँ होती हैं। कोई होने के लिए मजबूर नहीं कर

सकता। दुःख को कोई नहीं टाल सकता, न कोई उसे बढ़ा सकता है और न

कोई उसे कम कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को सांसारिक अनुभवों से गुजरना

ही चाहिए।

  1. तीसरी परम्परा (विचारधारा) ‘उच्छेदवाद’ के नाम से जानी जाती थी। इसके प्रमुख

प्रस्तुतकर्ता अजित केसकम्बल थे। इनका विचार एक प्रकार का सर्वनाशवाद था।

उन्होंने बताया कि यज्ञ, होम में कुछ नहीं है_ कर्मों के फल जैसी कोई चीज

नहीं है जिसे आत्मा उपयोग कर सके या उसे भुगत सके। न तो कोई स्वर्ग

है और न ही नरक। आदमी सांसारिक दुःखों के कुछ तत्वों द्वारा निर्मित है।

आत्मा इससे बच नहीं सकती। संसार में जो दुःख और कष्ट हैं, उनसे आत्मा

नहीं बच सकती। ये दुःख और कष्ट स्वतः मिट जाएँगे। आत्मा को महाकल्प

के चौरासी लाख जन्मों से होकर गुजरना ही पड़ेगा, तभी आत्मा के कष्ट और