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दुःख मिट सकते हैं, इसके न तो पहले और न ही किसी दूसरे साधन से।
- चौथी परम्परा ‘अन्योन्यवाद’ कहलाती थी। इसके प्रधान पकुध कच्चायन थे।
उन्होंने उपदेश दिया कि प्राणी सात तत्वों से बना है-पृथ्वी, जल, तेज, वायु,
सुख, दुःख और आत्मा। वे एक दूसरे से स्वतंत्र हैं, उनका एक-दूसरे पर प्रभाव
नहीं पड़ता। वे स्वतः निर्मित हैं और नित्य हैं। कोई उनका नाश नहीं कर
सकता। यदि कोई किसी आदमी का सिर भी काट दे, तो भी वह उसे मारना
नहीं होता, यह तो केवल इतना ही है कि अस्त्र सात तत्वों में प्रवेश कर गया
है।
- संजय बेलपुत्त के दर्शन की अपनी ही परम्परा थी। यह ‘विक्षेप-वाद’ के नाम
से जानी जाती थी। यह एक प्रकार का संदेहवाद था। उन्होंने तर्क दिया-‘‘यदि
मुझसे कोई पूछे कि स्वर्ग है?, यदि मैं महसूस करूँ कि स्वर्ग है तो मैं हाँ
कहूँगा। यदि महसूस करूँ कि स्वर्ग नहीं है, तो मैं नहीं कहूँगा। यदि मुझसे पूछा
जाए कि क्या मानवों का निर्माण होता है, अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल
आदमी को भोगना पड़ता है, मृत्यु के पश्चात् क्या आत्मा रहती है तो मैं ‘नहीं’
कहूँगा क्योंकि मुझे नहीं लगता है कि इन सबका कोई अस्तित्व है। संक्षेप में
संजय बेलपुत्त का यही मत था।’’
- दर्शन की छठी परम्परा ‘चतुर्यामसंवरवाद’ के नाम से जानी जाती है। इसके
प्रमुख महावीर थे, जो उस समय जीवित थे, तब गौतम प्रकाश की खोज में
थे। महावीर निगण्ठनाथ पुत्र भी कहे जाते थे। महावीर का कहना था कि अपने
पूर्व और वर्तमान जीवन के बुरे कर्मों के कारण आत्मा को पुनर्जन्म ग्रहण करना
पड़ता है। इसलिए उन्होंने सलाह दी कि बुरे कर्मों को तपश्चर्या द्वारा समाप्त
करना चाहिए। वर्तमान जीवन में बुरे कर्मों से रोकने के लिए महावीर ने चातुर्याम
धर्म अर्थात् चार नियमों का पालन करने का उपदेश दिया-(1) हिंसा न करना,
(2) चोरी न करना, (3) झूठ न बोलना और (4) धन संग्रह न करना और
ब्रह्मचर्य का पालन करना।
2. अपने समकालीनों के प्रति व्यवहार
बुद्ध ने इन नए दार्शनिकों के विचार को स्वीकार नहीं किया।
उनके विचारों को अस्वीकार करना अकारण नहीं था। उन्होंने कहा-
यदि पूर्ण काश्यप या प्रकुध कच्चायन के विचार सही हैं, तब तो कोई कुछ भी
बुरा कर सकता है, किसी को कुछ भी हानि पहुँचा सकता है, एक दूसरे की