96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. वे सिद्धान्त जिन्हें उन्होंने अस्वीकार किए
- इस प्रकार का दार्शनिक और धार्मिक पर्यवेक्षण यह दिखाता है कि बुद्ध के
शासन (सासन) स्थापना के समय कुछ खास विचार लोगों के दिमाग में घर
कर गए थे। वे इस प्रकार थे -
(1) वेदों में अनन्य (अचूक) विश्वास_
(2) मोक्ष या आत्मा की मुक्ति अर्थात् पुनर्जन्म पर रोकने में विश्वास_ अर्थात्
वेदों को स्वतः प्रमाण मानना_
(3) धार्मिक संस्कारों एवं यज्ञों को मोक्ष के साधन मानने में विश्वास_
(4) चातुर्वर्ण्य को सामाजिक संगठन का आदर्श मानने में विश्वास_
(5) ईश्वर को सृष्टिकर्ता और ब्रह्म को विश्व का मूल स्रोत मानने का
विश्वास_
(6) आत्मा में विश्वास_
(7) संसार चक्र के साथ-साथ अर्थात् आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास_
(8) कर्मवाद में विश्वास अर्थात् अपने पूर्व-जन्म में किए कर्मों के आधार
पर वर्तमान जीवन में आदमी की स्थिति में विश्वास करना। 2. अपने शासन के सिद्धांतों को स्थापित करते समय बुद्ध ने इन पुराने विचारों को
अपने ही ढंग से लिया।
- निम्नलिखित विचारों को उन्होंने अस्वीकार कर दियाः
(1) इस प्रकार के व्यर्थ के मानसिक संकल्प-विकल्प में डूबने की उन्होंने
निंदा की कि मैं कब, कहाँ से आया हूँ और मैं क्या कहूँ?
(2) उन्होंने आत्मा के बारे में सभी मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने आत्मा को न शरीर, न वेदना, न संज्ञा, न संस्कार और न विज्ञान
ही माना।
(3) उन्होंने कुछ धार्मिक गुरुओं के उच्छेदवादी मतों को नहीं माना।
(4) उन्होंने नास्तिकों के मतों की भी निन्दा की।
(5) उन्होंने इस सिद्धांत को नहीं माना कि विश्व-विकास का आरम्भ किसी
के ज्ञान से बंधा है।