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1. उपदेश देना या नहीं देना

  1. बोधि प्राप्त कर लेने और अपने मार्ग (सद्धर्म) को सूत्रबद्ध करने के उपरान्त, बुद्ध

के मन में शंका उत्पन्न हुई। क्या उन्हें आगे बढ़ना चाहिये और अपने मत (धर्म)

का उपदेश देना चाहिये या क्या उन्हें अपनी ही पूर्णता में स्वयं को समर्पित करते

रहना चाहिए?

  1. उन्होंने स्वयं से कहा, ‘‘सत्य ही मैंने एक नया मत उपार्जित कर लिया है। किन्तु

मानव-जाति के लिये इसको स्वीकार करना और इसका अनुसरण करना अत्यन्त

कठिन है। यहाँ तक कि बुद्धिमानों के लिए भी यह अत्यंत गूढ़ (जटिल) है। 3. मनुष्य मात्र के लिए स्वयं को ईश्वर और आत्मा के जंजाल से मुक्त करना कठिन

है। मनुष्यों के लिये धार्मिक संस्कारों और अनुष्ठानों के प्रति अपने विश्वास का

त्याग करना कठिन है। मनुष्यों के लिये कर्म में अपने विश्वास का त्याग करना

कठिन है।

  1. ‘‘मनुष्यों के लिये आत्मा की अनश्वरता के प्रति अपने विश्वास का त्याग करना

और मेरे मत को स्वीकार करना कि आत्मा का एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में कोई

अस्तित्व नहीं है और वह मृत्यु के उपरान्त विद्यमान नहीं रहती है, कठिन है।’’ 5. मनुष्य अपनी स्वार्थपरता में दत्त चित्त है और इसी में हर्ष और आनन्द प्राप्त करता

है। मनुष्यों के लिये स्वार्थपरता का दमन करते हुए सद्धर्भ के मेरे मत को स्वीकार

करना कठिन है।

  1. ‘‘यदि मैं अपने मत का उपदेश दूँ और दूसरे इसको न समझें, या इसको समझते

हुए स्वीकार न करें या इसको स्वीकार करते हुए इसका अनुसरण न करें, तो यह

दूसरों के लिए थकावट और मेरे लिए एक उत्पीड़न होगा।’’

  1. ‘‘क्यों नहीं संसार से दूर एक संन्यासी ही रहूँ और अपने सिद्धांत का स्वयं अपनी

पूर्णता में उपयोग करूँ?’’ उन्होंने स्वयं से पूछा। ‘‘कम से कम मैं स्वयं का

कल्याण तो कर सकता हूँ।’’

  1. इस प्रकार चिन्तन करने पर, उनका मन निष्क्रियता, सिद्धान्त की शिक्षा न देने की

ओर मुड़ गया।

  1. तब ब्रह्मा सहम्पति ने यह जानते हुए कि बुद्ध के मन में क्या विचार चल रहा

है सोचा, ‘‘वस्तुतः संसार नष्ट होने जा रहा है, वस्तुतः संसार विनाश की ओर

जा रहा है, यदि सम्यक् सम्बुद्ध तथागत अपने मत की शिक्षा देने के स्थान पर

निष्क्रियता की ओर मुड़ते हैं।’’

  1. चिन्ता से ग्रसित हो ब्रह्मा सहम्पति ने ब्रह्म लोक को छोड़ा और बुद्ध के समक्ष