1. उपदेश देना या नहीं देना - Page 131

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

प्रकट हुए। अपने ऊपरी वस्त्र को एक कंधे पर व्यवस्थित करते हुए वे नीचे झुके

और हाथ जोड़कर बोले, ‘‘आप अब सिद्धार्थ गौतम नहीं हैं, आप बुद्ध हैं। आप

सम्यक् सम्बुद्ध हैं। आप तथागत हैं। आप संसार को प्रबुद्ध करने से कैसे इन्कार

कर सकते हैं? आप भ्रमित मानवता को बचाने से कैसे इन्कार कर सकते हैं?’’

  1. ‘‘यहाँ अशुद्धता से परिपूर्ण प्राणी हैं, जो धम्योपदेश को न सुनने के कारण पतन

को प्राप्त हो रहे हैं।’’

  1. ब्रह्मा सहम्पति ने आगे कहा, ‘‘भगवान! जैसा कि आप जानते है प्राचीन काल में

मगध के लोगों के बीच अनेक दोषों से युक्त, अशुद्ध मत उत्पन्न हुआ था।’’

  1. ‘‘क्या भगवान! उनके लिये अपने अमृत मत के द्वार नहीं खोलेंगे?’’

  2. ‘‘जिस प्रकार एक पथरीले पहाड़ पर खड़ा कोई व्यक्ति, अपने चारों ओर आस-पास

खड़े लोगों का अवलोकन करता है, उसी प्रकार आप जो प्रज्ञा के शिखर पर

पहुंचे हुए हैं, सभी अन्य लोगों से ऊपर हैं, दुःख से रहित आप, उन लोगों को

जो अपने दुःखों के सागर में गोते खा रहे है, अवलोकन करें, नीचें देखें।’’

  1. हे वीर! युद्ध में विजेता! हे सार्थवाह! जन्म के ऋण से मुक्त, संसार में जायें और

उससे विमुख न हों।

  1. ‘‘भगवान! अपनी करुणा से मनुष्यों और देवताओं को अपने सद्धर्म का उपदेश

करें।’’

  1. बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘हे ब्रह्मा, मनुष्यों ने उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ, यदि मैं अपने सद्धर्म

की सार्वजनिक अभिव्यक्ति नहीं करता हूँ, तो यह इसलिये कि मैंने उत्पीड़न

अनुभव किया था।’’ किन्तु मेरे धम्म को लोग समझ नहीं पाएंगे)।

  1. यह जानते हुए कि संसार में इतना अधिक दुख है बुद्ध ने स्पष्ट अनुभव किया

था कि उनके लिये हाथ पर हाथ धरे एक संन्यासी की तरह बैठना और वस्तुओं

को यथास्थिति बने रहने देने की अनुमति देना ठीक न होगा।

  1. उन्होंने तपश्चर्या को व्यर्थ पाया। संसार से बचने का प्रयास बेकार था। यहाँ तक

कि एक संन्यासी के लिये भी संसार से कोई मुक्ति नहीं है। उन्होंने एक अनुभूति

की कि जो आवश्यक है वह संसार से मुक्ति नहीं है। जो आवश्यक है वह है

संसार को परिवर्तित करना और उसे श्रेष्ठतर बनाना।

  1. बुद्ध ने स्पष्ट अनुभव किया कि उन्होंने संसार का त्याग इसलिए किया था कि वहाँ

इतना अधिक संघर्ष है, जो दुख और कष्ट का कारण है और जिसका कोई इलाज

वे नहीं जानते थे। यदि वे अपने धम्म का प्रचार द्वारा संसार से दुख और कष्ट को

निर्वासित कर सकते हैं, तो यह उनका कर्तव्य होगा कि वे संसार की ओर लौटें

और उसकी सेवा करें। निष्क्रिय भावशून्यता के मूर्तिमान की तरह शाँत न बैठें।