104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
3. दो प्रकार के धर्मांतरण
बुद्ध की वस्तुओं की व्यवस्था में धर्मांतरण के दो अर्थ हैं।
भिक्षुओं के गण, जिसे ‘संघ’ कहा जाता है, में धर्मान्तरण।
दूसरा, इसका अर्थ एक गृहस्थ का एक उपासक या बुद्ध के धर्म के गृहस्थ
अनुयायी का धर्मांतरण है।
- चार बातों के अतिरिक्त भिक्षु और उपासक की जीवन-पद्धति में कोई अन्तर नहीं
है।
- उपासक एक गृहस्थ बना रहता है। भिक्षु एक गृह-रहित घुमक्कड़ बन जाता है।
- उपासकों और भिक्षुओं दोनों को ही अपने जीवन में कुछ निश्चित नियमों का
अवश्य पालन करना होता है।
- यहाँ पुनः भिक्षु के लिये वे व्रत हैं, जिनके अतिक्रमण की परिणति दण्ड में होती
है। उपासक के लिये वे शिक्षाप्रद है। उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार पालन करने
का अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिये।
उपासक के पास सम्पत्ति हो सकती है, भिक्षु के पास नहीं।
उपासक बनने के लिये कोई धर्मानुष्ठान नहीं है।
भिक्षु बनने के लिये उसे अवश्य ही एक धर्मानुष्ठान से गुजरना पड़ता है जिसे
उपसम्पदा कहा जाता है।
- बुद्ध ने उन सभी को जो उनके पास आये, उनकी इच्छा के अनुसार या तो भिक्षु
के रूप में या उपासक के रूप में धर्मान्तरित किया।
- एक उपासक एक भिक्षु बन सकता है, जब कभी भी वह ऐसा अनुभव करता
है।
- और भिक्षु तब भिक्षु नहीं रह जाता, जब वह मुख्य-व्रतों का अतिक्रमण करता है
या जब कभी भी वह संघ की सदस्यता को छोड़ देने की इच्छा करता है। 14. ऐसा अवश्य ही नहीं समझा जाना चाहिये कि बुद्ध ने केवल उन्हीं लोगों को
धर्मान्तरित किया, जिनके नाम आगामी पृष्ठों में आये हैं।
- उदाहरण केवल यह दर्शाने के लिये चुने गये हैं कि अपने संघ में व्यक्तियों को
सम्मिलित करने या अपने धर्म का उपदेश देने में वे जाति या लिंग के किसी
विभेद का पालन नहीं करते थे।