106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. सारनाथ आगमन
- अपने धर्म का उपदेश देने का निश्चय कर लेने के पश्चात् बुद्ध ने स्वयं से यह पूछा,
‘‘किसको मैं सर्वप्रथम धम्म की शिक्षा दूँ?’’ उन्होंने आलार-कालाम के विषय में
सोचा जिन्हें, बुद्ध विद्वान, बुद्धिमान, मेधावी के रूप में और अल्प अशुद्धता वाले
मानते हुए सम्मान करते थे, ‘‘कैसा हो यदि मैं सर्वप्रथम उन्हें धम्म की शिक्षा
दूँ?’’ लेकिन उन्हें बताया गया कि आलार-कालाम की मृत्यु हो चुकी है।
- तब उन्होंने उद्दक रामपुत्र को इसका उपदेश देने का विचार किया, लेकिन उनकी
भी मृत्यु हो चुकी थी।
- तब उन्होंने अपने पाँच पुराने साथियों के विषय में सोचा, जो उनके साथ निरंजना
नदी के तट पर थे, जब वे तपस्या का अभ्यास कर रहे थे और जो तपस्या के
परित्याग के कारण क्रोध में उनको छोड़कर चले गये थे।
- ‘‘उन्होंने मेरे लिए बहुत कुछ किया, मेरी सेवा की और मेरा ध्यान रखा, कैसा
हो यदि मैं सर्वप्रथम उनको धम्म की शिक्षा दूँ?’’ उन्होंने स्वयं से कहा।
- उन्होंने उनके पते-ठिकाने के विषय में ज्ञात किया। यह जान कर कि वे सारनाथ
में इसिपतन के मृगदाय में निवास कर रहे हैं, वे उनकी खोज में चल पड़े।
- उन पाँचों ने, बुद्ध आते हुए देख कर, स्वयं आपस में उनका स्वागत न करने
का निर्णय किया। उनमें से एक बोला, ‘‘मित्रों! यह तपस्वी गौतम आ रहा है,
जिसने तपस्या का परित्याग कर दिया है और समृद्धि एवं विलासिता के जीवन
की ओर मुड़ गया है। उसने पाप किया है। अतः हम अवश्य ही न तो उनका
स्वागत करेंगे, न सम्मान में उठ कर खड़े होंगे, और न ही उनका भिक्षा-पात्र
और चीवर ग्रहण करेंगे। हम केवल उनके लिये एक आसन अलग रख देंगे।
यदि उनकी इच्छा होगी, वे बैठ जायेंगे।’’ और वे सभी सहमत हो गये।
- लेकिन जब बुद्ध निकट आये, पाँचों परिव्राजक अपने निर्णय पर अटल रहने में
सक्षम न रह सके थे, वे उनके व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित हुए कि वे
सभी अपने आसनों पर उठ खड़े हुए थे। एक ने उनका पात्र पकड़ा, एक ने
उनका चीवर पकड़ा, एक ने एक आसन तैयार किया, और एक उनके चरण
धोने के लिए पानी ले आया।
यह वास्तव में अप्रिय-अतिथि का एक महान स्वागत था।
इस प्रकार वे जो उपहास करने को अभिप्रेत थे, श्रद्धाबद्ध बने रह गये।