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2. बुद्ध का पहला प्रवचन (धम्मचक्र प्रवर्तन)
- अभिवादन और कुशल-क्षेम के आदान-प्रदान के उपरान्त पाँचों परिव्राजकों ने
बुद्ध से पूछा कि- ‘‘क्या वे अभी भी तपश्चर्या में विश्वास रखते हैं?’’ बुद्ध
ने नकारात्मक उत्तर दिया।
- बुद्ध ने कहा, ‘‘एक भोग-विलास का जीवन और दूसरा काय-क्लेष का जीवन
दो अतियां होती हैं।’’
- एक कहता है, आओ हम खाओ-पीओ, मौज करो, क्योंकि कल हम मर जायेंगे।
दूसरा कहता है, सभी वासनाओं का दमन करो, क्योंकि वे पुनर्जन्म का कारण हैं।
उन्होंने दोनों को अस्वीकार किया था, क्योंकि वे मनुष्य के लिये अनुपयुक्त थीं।
- क्योंकि वे मध्य मार्ग (मज्झिम पटिपदा) को मानने वाले थे, जो न तो भोग-विलास
का मार्ग है और न ही काय-क्लेष का मार्ग है।
- ‘‘मुझे इसका उत्तर दो,’’ बुद्ध ने परिव्राजकों से पूछा, जब तक तुम्हारा मन सक्रिय
रहता है और भले ही सांसारिक या दिव्य भोग-विलासों के पीछे लालायित बना
रहता है, क्या सभी काय-क्लेष व्यर्थ नहीं हैं? और उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘यह
वैसा ही है जैसा आप कहते हैं।’’
- ‘‘तुम किस प्रकार काय-क्लेष का एक तुच्छ जीवन बिताकर अपने आप को
मुक्त कर सकते हो, यदि तुम उसके द्वारा कामुकता की अग्नि को बुझाने में
असफल नहीं हो सकते?’’ और उन्होंने उत्तर दिया, यह वैसा ही है जैसा आप
कहते हैं।
- जब आप अपने आप पर विजय पा लेंगे, तभी आप काय-तृष्णा से मुक्त होंगे,
तब तुम सांसारिक भोग-विलासों की इच्छा नहीं करोगे, और तुम्हारी प्राकृतिक
इच्छाओं की सन्तुष्टि तुम्हें दूषित नहीं करेगी। तुम अपने शरीर की आवश्यकताओं
के अनुसार खाना और पीना करो।
- ‘‘सभी प्रकार की काम-वासना उत्तेजक होती है और शक्ति का ”ास करने
वाली होती है। विषयासक्त मनुष्य अपनी काम-वासना का दास होता है। सभी
भोग-विलासों की चाह करना स्वयं को गिराना है और अभद्र एवं नीच कर्म है।
लेकिन मैं तुम से कहता हूँ कि जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना कोई
बुराई नहीं है। शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखना एक कर्त्तव्य है, अन्यथा तुम मन
को दृढ़ और स्पष्ट बनाये रखने और प्रज्ञा-दीप को प्रज्ज्वलित रखने में सक्षम
न हो सकोगे।’’