122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. यश का धर्मांतरण
- उस समय वाराणसी में एक कुलीन व्यक्ति का पुत्र रहता था, उसका नामा यश वह
उम्र से युवा और रूप-रंग में अत्यधिक आकर्षक था। वह अपने माता-पिता का
परमप्रिय था। वह प्रचुर धन-सम्पदा में रहता था। उसके पास अनेक नौकर-चाकर
और एक विशाल अन्तःपुर में अनेक स्त्रियां थीं तथा वह अपना समय केवल
नृत्य, शराब पीने एवं भौतिक आनन्दों में व्यतीत करता था।
- समय बीतने पर, विरक्ति की एक भावना उस पर छा गई। किस प्रकार वह इस
काम-वासना के जीवन से बच सकता है? जो जीवन वह व्यतीत कर रहा है
क्या उससे उत्तम जीवन जीने का कोई मार्ग था? क्या करूँ यह न जानते हुए,
उसने पिता का घर छोड़ने का निश्चय किया।
- एक रात उसने अपने पिता का घर छोड़ दिया और इधर-उधर भटक रहा था_
वह संयोग से ऋषिपतन की ओर चला गया।
- थकान अनुभव करते हुए वह एक जगह बैठ गया और जैसे ही वह बैठा उसने
ऊँची आवाज में स्वयं से कहाः ‘‘मैं कहाँ हूँ? यह मार्ग क्या है? ओह! क्या
परेशानी है? ओह! कितना संकट है!’’
- यह घटना उसी रात है जिस दिन तथागत ने ऋषिपतन में पंचवर्गीय भिक्षुओं को
अपने पहले उपदेश का प्रवचन किया था। ठीक उसी समय जब यश ऋषिपतन
की ओर बढ़ रहा था, तथागत जो ऋषिपतन में ठहरे हुए थे, प्रातः उठ कर,
खुली हवा में चहलकदमी कर रहे थे और तथागत ने यश नामक कुलीन युवक
को अपनी दुःखत अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देते हुए आते देखा!
- और तथागत ने उसका दुख भरा रोना सुन कर कहा-‘‘कोई दुख नहीं है, कोई
संकट नहीं है। आओ, मैं तुम्हें मार्ग दिखलाऊँगा’’, और तथागत ने यश को
अपने धर्म का उपदेश दिया।
- और यश ने जब उसने यह उपदेश सुना, प्रसन्न और हर्षित हो गया उसने अपने
सुनहरे जूते उतारे और जाकर तथागत के पास बैठ गया एवं उन्हें सम्मानपूर्वक
प्रमाण किया।
- यश ने बुद्ध के वचन हृयंगम कर, उनसे उसे अपना शिष्य बना लेने की प्रार्थना
की - उस समय यश के चार मित्र थे, जो वाराणसी के धनी परिवारों के पुत्र
थे। उनके नाम थे विमल, सुबाहु, पुण्यजित और गवाम्पति।